वीआईपी का परिचय (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 08, 2025

वीआईपीज़ वास्तव में जैसे होते हैं वैसे दिखते नहीं। इनकी पोशाक उन्हें बदल देती है। अधिकांश वीआईपीज़ का कद कम से कम सात फुट होता है। कुछ शानदार, जानदार वीआईपी का कद ज़्यादा भी हो सकता है। इनका कद पहुंच की सक्रियता के मुताबिक बढ़ता रहता है। इनकी जड़ें भी बहुत गहरी होती हैं जिन्हें नापना मुश्किल होता है। इन्हें इंच या फुट में नहीं बताया जा सकता। वीआईपीज़ का रंग भी गिरगिट की तरह बदलता रहता है कब कौन सा रंग है इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता। जो सच्चा और ठोस वीआईपी होता है वह छोटा मोटा खेल नहीं खेलता। यह पता नहीं चल पाता कि कौन सा खेल, खेल रहा है। कई बार वह बैडमिंटन को इस तरह खेलता है कि लगे टेबल टेनिस खेल रहा है। काम निबटाते हुए वह दांव कुछ और लगा रहा होता है लेकिन दिखाता कुछ और है।  

इनके साथ चाय पीकर, खाना खाकर या बढ़िया किस्म की पीकर ज़्यादा मज़ा आता है। वह शानदिखाऊ लम्हे फेसबुक पर शेयर करते हुए गर्व महसूस होता है, जब बताया जाता है कि फलां फलां के साथ खाना खाते हुए, जो अब ज्यादा बड़े वीआईपी बनने वाले हैं। यह हमारे मित्र और रिश्तेदार दोनों हैं। आम लोग भी लाईक करते हुए सम्मानित महसूस करते हैं। यह वीआईपीनेस की महिमा है कि लाखों लोग कोशिश और जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किसी तरह वीआईपी जगत का हिस्सा हो जाएं। वीआईपी चाहे छोटा हो वीआईपी ही माना जाता है। छोटा आदमी खुद को बड़ा समझ सकता है लेकिन बड़ा आदमी कभी खुद को छोटा समझने और दिखने की गलती नहीं कर सकता। 

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कुर्सी वाले वीआईपी कुछ लिख दें तो कितने ही प्रकाशक किताब छापने को तैयार हो जाते हैं। किताब छप जाए तो छोटे मोटे साहित्यकार द्वारा विमोचन तो दूर, उसे विमोचन समारोह में भी शायद ही बुलाया जाता है। आम लोग उन्हें अपने बच्चों के विवाह समारोहों में बुलाकर धन्य हो जाते हैं वह बात दीगर है कि इनका इंतज़ार करना ही पड़ता है। इनके विशाल वाशरूम में लगे खूबसूरत नल, शावर इत्यादि को देखकर लगता नहीं कि दुनिया में पानी कम हो रहा है। सर्दी हो या गरमी, वीआईपी सार्वजनिक स्थल पर भी कम पानी में नहीं नहा सकते। पानी डूब मरने के लिए कम हो रहा है तभी तो वीआईपी कहते हैं कि आम लोगों के लिए नर्क जैसी परिस्थितियों वाले जीवन से अच्छा है नदी के किनारे भगदड़ में मर कर सीधे स्वर्ग जाना।

वीआईपी बहुत समझदार व्यक्ति होते हैं, किसी कुप्रबंधन के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते। इनकी सामाजिक मजबूरियां इन्हें जकड़े रखती हैं। अपनी बोलती बंद रखकर, आम आदमी की मुखर होती आवाज़ को दबाए रखना, इन्हें खुद के स्वाभिमान की रक्षा करना लगता है। वीआईपी महान श्रेणी के लोग होते हैं।

- संतोष उत्सुक  

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