Oman में वार्ता की मेज से लेकर युद्ध के मैदान तक...Iran और US ने एक दूसरे के खिलाफ पूरा जोर लगाकर दुनिया को चिंता में डाला

By नीरज कुमार दुबे | Feb 06, 2026

ईरान पर युद्ध के मंडराते बादल अब और घने होते जा रहे हैं क्योंकि ओमान में बातचीत के लिए आये ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधियों ने सीधे तौर पर बातचीत नहीं की। बातचीत ओमान की मध्यस्थता में हुई। यानि ईरान अपनी बात ओमान से कहता, ओमान वही बात जाकर अमेरिका से कहता और अमेरिकी जवाब को आकर ईरानी प्रतिनिधि को बताता। साथ ही इस वार्ता से पहले दोनों ओर से जिस तरह के धमकी भरे बयान आये और भारी हथियारों की तैनाती की गयी उससे यह साफ हो चला था कि वार्ता महज दिखावा है।


वार्ता से पहले बढ़ा तनाव


हम आपको बता दें कि ओमान ने कहा है कि उसके विदेश मंत्री ने मस्कट में ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडलों से अलग अलग मुलाकात कर परमाणु मामले पर परोक्ष वार्ता को आगे बढ़ाया। बताया जा रहा है कि वार्ता स्थल पर ईरान इस बात से भड़क गया कि अमेरिकी दल में एडमिरल ब्रैड कूपर जैसे सैन्य अधिकारी मौजूद थे। देखा जाये तो बीते वर्ष ईरान के परमाणु ढांचे पर हुए अमेरिकी हमले के बाद भले पहली औपचारिक वार्ता हुई लेकिन उससे पहले ही बयानबाजी, सैन्य जमावड़े और परोक्ष धमकियों ने माहौल को बारूदी बना दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई को खुली चेतावनी दी कि उन्हें बहुत चिंतित रहना चाहिए। यह चेतावनी उस समय आयी है जब ईरान के भीतर सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर कड़ी कार्रवाई हुई, इंटरनेट पर पाबंदी लगी और सड़कों पर असंतोष उभरा।


वार्ता के मुद्दे


हम आपको बता दें कि ओमान की राजधानी मस्कट में हुई वार्ता में ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेड कुश्नर शामिल हुए। वार्ता शुरू होने से पहले भी अनिश्चितता बनी रही। खबरें आयीं कि आधिकारिक शुरुआत टली हुई है लेकिन बाद में स्पष्ट हुआ कि संदेश ओमान के जरिये आगे पीछे किये जा रहे हैं। हम आपको बता दें कि अमेरिका ने वार्ता से पहले कहा था कि वह चाहता है कि परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता, क्षेत्र में सशस्त्र समूहों को समर्थन और अपने नागरिकों के साथ ईरान के व्यवहार पर भी चर्चा हो मगर तेहरान ने साफ कह दिया था कि बात केवल परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध हटाने तक सीमित रहेगी।

 

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ईरान ने संकेत दिये हैं कि वह यूरेनियम संवर्धन पर कुछ लचीलापन दिखा सकता है, यहां तक कि उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का कुछ भंडार सौंपने या साझा व्यवस्था के तहत शून्य संवर्धन तक पर विचार कर सकता है। पर साथ ही वह कहता है कि संवर्धन का अधिकार सौदे का विषय नहीं और 2018 के बाद फिर लगाये गये प्रतिबंध हटने चाहिए।


ईरान का शक्ति प्रदर्शन


इसी बीच, ईरानी सरकारी प्रसारण ने बताया कि उसकी सबसे उन्नत लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल खुर्रमशहर चार को भूमिगत मिसाइल नगर में तैनात किया गया है। इसकी मारक दूरी 1240 मील से अधिक और भारी वारहेड ढोने की क्षमता बतायी गयी है। इस दौरान ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के राजनीतिक उप प्रमुख यदोल्लाह जवानी ने दो टूक कहा कि कूटनीति अपनाने का अर्थ सैन्य ताकत छोड़ना नहीं है, ईरान युद्ध नहीं चाहता पर यदि दूसरी ओर से गलती हुई तो जवाब निर्णायक होगा। यह सब उस समय हुआ जब ट्रंप प्रशासन ने हाल के सप्ताहों में पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी और साधन बढ़ाये हैं, जिससे साफ है कि वार्ता की मेज के नीचे भी दबाव की राजनीति पूरी ताकत से चल रही है।


समुद्र में अमेरिका को घेरेगा ईरान!


ईरान समुद्री मोर्चे पर सीधी बराबरी की जगह अपनी युद्ध नीति पर भरोसा करता है। उसका लक्ष्य है कि खाड़ी का जलक्षेत्र इतना जोखिम भरा बना दिया जाये कि किसी भी अमेरिकी विमान वाहक पोत के लिए वहां ठहरना महंगा सौदा लगे। ईरान जानता है कि जहाज दर जहाज मुकाबला उसके बस की बात नहीं, इसलिए वह सस्ते और असरदार हथियार, तेज नौकाएं, मानवरहित यान और तंग जलमार्ग का सहारा लेकर महंगे दुश्मन साधनों को निशाना बनाने की सोच रखता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य अपने सबसे संकरे हिस्से में बहुत कम चौड़ा है, जहां बड़े पोतों की चाल सीमित हो जाती है और वे अनुमानित रास्तों पर चलने को मजबूर होते हैं। उत्तरी तट पर पकड़ रखने वाला ईरान जमीन से मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र और तटीय ठिकानों से ऐसे पोतों को आसानी से साध सकता है।


रिवोल्यूशनरी गार्ड की नौसेना के पास सैकड़ों छोटी और तेज आक्रमण नौकाएं हैं जिन पर मशीनगन, राकेट और टारपीडो लगे रहते हैं। ये नौकाएं झुंड की नीति अपनाती हैं, यानी एक ही बड़े पोत पर कई दिशाओं से एक साथ धावा। पारंपरिक रक्षा तंत्र दूर से आते प्रक्षेपास्त्र रोकने में सक्षम हो सकता है, पर एक साथ आती अनेक छोटी नौकाओं और मानवरहित यानों पर नजर रखना कठिन हो जाता है। ईरान ने समुद्र में चलते जहाजों को साधने वाले खास प्रक्षेपास्त्र भी विकसित किये हैं जिनकी मारक दूरी सैकड़ों किलोमीटर बतायी जाती है और जिनकी रफ्तार बहुत तेज कही जाती है। कम कीमत वाले शाहेद जैसे मानवरहित यान बड़ी संख्या में भेजे जाएं तो वे रक्षा कवच पर दबाव डालते हैं, और भले ही कई गिरा दिये जाएं, लागत का अंतर ईरान के पक्ष में रहता है।


इसके साथ ही गदीर श्रेणी की छोटी पनडुब्बियां उथले पानी के लिए ढाली गयी हैं। ये समुद्र तल के पास छिपकर घात लगा सकती हैं और भारी टारपीडो से बड़े युद्धपोत को नुकसान पहुंचा सकती हैं। समुद्री बारूदी सुरंगें भी ईरान के शस्त्रागार का अहम हिस्सा हैं; संकरे जलमार्ग में एक सुरंग भी बहुमूल्य पोत को लंबे समय के लिए निष्क्रिय कर सकती है। हाल में फत्ताह दो जैसे अति तीव्र गति वाले प्रक्षेपास्त्र के दावे भी किये गये, जिन्हें रोकना कठिन बताया जाता है। ईरान की सोच साफ है: दुश्मन के एक महंगे पोत की कीमत में वह अनेक हमले कर सकता है। 2002 के एक अमेरिकी सैन्य अभ्यास में भी दिखा था कि झुंड नीति और अनोखे तरीके भारी तकनीक पर भारी पड़ सकते हैं। यही भरोसा तेहरान को टकराव की स्थिति में मनोवैज्ञानिक बढ़त देता है।


ट्रंप का बड़ा बयान


दूसरी ओर ट्रंप का दावा है कि पिछले हमलों से ईरान के परमाणु ढांचे का पूर्ण विनाश हुआ और इसी से पश्चिम एशिया में शांति बनी रही। उनका कहना है कि यदि हमला न होता तो अरब देश कभी निश्चिंत नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान नये स्थलों पर कार्यक्रम फिर शुरू करने की सोच रहा था, जिसे अमेरिका ने पहले ही भांप लिया और सख्त चेतावनी दी। हम आपको यह भी बता दें कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पहले ही कह दिया था कि विशेष दूत स्टीव विटकॉफ बैठक के लिए तैयार हैं और अमेरिका संवाद चाहता है, हालांकि समझौते को लेकर भरोसा पक्का नहीं है।


होने लगी भिड़ंत


इसके अलावा, दोनों देशों के बीच तनाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं है। अरब सागर में एक अमेरिकी विमान वाहक पोत ने अपने पास आये एक ईरानी मानवरहित विमान को मार गिराया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की नौकाओं ने अमेरिकी झंडा लगे तेल वाहक जहाज के पास जाकर उसे रोकने की धमकी दी थी। हम आपको बता दें कि यह वही समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए यहां जरा-सी चिंगारी भी वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला सकती है।


अमेरिका की तैयारी


इस बीच, अमेरिका ने अपने नागरिकों को ईरान तुरंत छोड़ने की सलाह दी है। कहा गया है कि सरकारी मदद पर निर्भर न रहें, वैकल्पिक संपर्क साधन रखें, सड़कों पर प्रदर्शनों से दूर रहें और सुरक्षित स्थान पर खाद्य, जल और दवाओं का भंडार रखें। दोहरी नागरिकता वालों को ईरानी यात्रा दस्तावेज से निकलने की सलाह दी गयी है। देखा जाये तो क्षेत्रीय परिदृश्य बदल चुका है। गाजा संघर्ष के बाद और सीरिया में बशर अल असद के पतन से तेहरान के कई क्षेत्रीय साथी कमजोर पड़े हैं। इजराइली नेतृत्व ईरान की मिसाइल और परमाणु महत्वाकांक्षा को दोहरी बीमारी बताता रहा है। ऐसे में वार्ता केवल दो देशों की नहीं, पूरे क्षेत्र की दिशा तय कर सकती है।


ओमान को ही वार्ता के लिए क्यों चुना गया?


अब सवाल है कि ओमान को ही वार्ता के लिए क्यों चुना गया? दरअसल ओमान लंबे समय से दोनों पक्षों के बीच भरोसेमंद मध्यस्थ रहा है। उसने पहले भी गुप्त और खुली बातचीत के लिए शांत मंच दिया। वह खाड़ी का ऐसा देश है जो टकराव से दूरी रखता है, सब पक्षों से बात करता है और सुरक्षा के साथ गोपनीयता भी देता है। मस्कट भौगोलिक रूप से नजदीक है, समुद्री पहुंच सरल है और वहां बातचीत बिना शोर के हो सकती है। तेहरान को वहां सम्मानजनक माहौल मिलता है और वाशिंगटन को तटस्थ पुल। यही कारण है कि जब सीधे संवाद कठिन हों, तो रास्ता मस्कट से होकर जाता है।

 

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बहरहाल, यह भी साफ दिख रहा है कि यह शक्ति संतुलन की जंग है। ट्रंप की कड़ी भाषा घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय संदेश दोनों साधती है। वहीं तेहरान की मिसाइल तैनाती बताती है कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है। पर सच यह भी है कि युद्ध किसी के हित में नहीं है। एक तरफ तेल मार्ग, दूसरी तरफ परमाणु फैलाव का डर, तीसरी तरफ जन असंतोष से जूझता ईरान और चौथी तरफ चुनावी गणित साधता अमेरिका। वैसे समझदारी इसी में है कि दोनों पक्ष सहमति का रास्ता तलाशें। ओमान ने दरवाजा खोला है, जिससे गुजरना दोनों को है। वरना इतिहास गवाह है, पश्चिम एशिया की चिंगारी अक्सर दुनिया भर में धुआं बनकर फैलती है।


-नीरज कुमार दुबे

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