Tehran की सड़कों पर Iran ने कराई अपनी खतरनाक मिसाइलों की परेड, खाड़ी देश सहमे, अमेरिका को आया पसीना!

By नीरज कुमार दुबे | Apr 22, 2026

ईरान में सैन्य प्रदर्शन और कूटनीतिक गतिविधियां एक साथ चलती नजर आ रही हैं। एक ओर राजधानी तेहरान सहित पूरे देश में सरकार समर्थित रैलियों में शक्तिशाली हथियारों का प्रदर्शन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश भी कर रही है। हम आपको बता दें कि तेहरान की सड़कों पर आयोजित मिसाइल परेड ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। खास बात यह है कि यह परेड संघर्षविराम अवधि समाप्त होने से ठीक पहले आयोजित की गयी थी। यानि ईरान अमेरिका को साफ संदेश दे रहा था कि यदि वह दोबारा युद्ध मैदान में आया तो तेहरान पूरी ताकत के साथ सामना करने के लिए तैयार है।

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साथ ही सैन्य प्रदर्शन के दौरान इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर द्वारा मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया गया। इनमें खोर्रमशहर-4 और घदर जैसी मिसाइलें शामिल हैं, जिन्हें अत्यंत घातक माना जाता है। खोर्रमशहर-4 को एक प्रकार का प्रलयकारी हथियार कहा जाता है, जो तरल ईंधन से संचालित होता है और तेज गति से हमला करने में सक्षम है। वहीं सिज्जिल मिसाइल भी चर्चा में रही, जिसकी मारक क्षमता लगभग दो हजार से ढाई हजार किलोमीटर तक बताई जाती है। यह मिसाइल क्षेत्रीय लक्ष्यों जैसे इजराइल, सऊदी अरब और पश्चिमी देशों के ठिकानों तक पहुंच सकती है।

इन सैन्य प्रदर्शनों का उद्देश्य केवल आंतरिक मनोबल बढ़ाना नहीं है, बल्कि बाहरी दुनिया को स्पष्ट संदेश देना भी है कि ईरान अपनी रक्षा क्षमता में लगातार प्रगति कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता मौजूद है, लेकिन फिलहाल उसका ध्यान पारंपरिक बैलिस्टिक शक्ति और ड्रोन तकनीक पर अधिक केंद्रित है। ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में भी ईरान ने उल्लेखनीय प्रगति की है। शाहिद जैसे आत्मघाती ड्रोन क्षेत्रीय संघर्षों में उपयोग किए गए हैं और इन्हें सटीक हमलों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करने की क्षमता भी ईरान की रणनीतिक ताकत का हिस्सा मानी जाती है, जो वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, इन सैन्य गतिविधियों के समानांतर ईरान कूटनीतिक प्रयास भी तेज कर रहा है। विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची हाल ही में मास्को पहुंचे, जहां उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कहा कि रूस ने उन्हें आवश्यक जानकारी प्रदान की है। इसके बाद उनका रोम जाने का कार्यक्रम है, जहां वह अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ से बातचीत कर सकते हैं।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी विरोधाभासी बातें सामने आ रही हैं। एक ओर अमेरिका की ओर से यूरेनियम संवर्धन को सीमित स्तर तक स्वीकार करने की बात कही जा रही है तो दूसरी ओर इसे पूरी तरह समाप्त करने की मांग भी की जा रही है। बताया जा रहा है कि यदि संवर्धन को 3.6 प्रतिशत तक सीमित किया जाता, तो यह 2015 के परमाणु समझौते के अनुरूप होता। इस समझौते के तहत ईरान को आर्थिक राहत मिली थी, बदले में उसने अपने परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण रखने का वादा किया था। लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से हटने के बाद स्थिति बदल गई। ईरान ने सभी सीमाएं तोड़ दीं और अब उसके पास लगभग 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन करने की क्षमता होने की बात कही जाती है, जो हथियार स्तर के करीब है।

इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ओर बातचीत की इच्छा जताई है, वहीं दूसरी ओर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था के प्रमुख राफेल ग्रोसी ने भी कहा है कि बातचीत एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुकी है। वहीं ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जहां कुछ कट्टरपंथी समूह अमेरिका के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, वहीं धार्मिक नेताओं ने सावधानी के साथ बातचीत जारी रखने की सलाह दी है। उनका मानना है कि अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए।

इस प्रकार ईरान इस समय दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। एक ओर वह अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है, जिससे संभावित विरोधियों को चेतावनी दी जा सके, वहीं दूसरी ओर वह कूटनीतिक समाधान की दिशा में भी प्रयासरत है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह संतुलन किस दिशा में जाता है और क्या परमाणु मुद्दे पर कोई ठोस समझौता हो पाता है या नहीं।

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