ईरान की ताकत बरकरार, अमेरिका के घटे हथियार! क्या इसी वजह से ट्रंप ने बढ़ाया युद्धविराम?

Donald Trump
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संघर्षविराम के ऐलान के बावजूद जमीन पर हालात पूरी तरह शांत नहीं हैं। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी जारी रखी है और अपनी सैन्य तैयारियों को बरकरार रखा है। वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि वह धमकियों और दबाव के माहौल में किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी संघर्षविराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ाने का ऐलान किया है। यह फैसला उस समय लिया गया जब संघर्षविराम समाप्त होने में कुछ ही घंटे बाकी थे और हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे थे। ट्रंप ने कहा कि यह कदम ईरान को एक साझा और स्पष्ट प्रस्ताव तैयार करने का समय देने के लिए उठाया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि यह निर्णय पाकिस्तान के अनुरोध पर लिया गया है। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस फैसले के लिए ट्रंप का धन्यवाद किया और इसे क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। ट्रंप ने भी अपने संदेश में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की भूमिका का जिक्र किया।

हालांकि, संघर्षविराम के ऐलान के बावजूद जमीन पर हालात पूरी तरह शांत नहीं हैं। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी जारी रखी है और अपनी सैन्य तैयारियों को बरकरार रखा है। वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि वह धमकियों और दबाव के माहौल में किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं है।

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इस बीच, इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में हवाई हमले जारी रखे हैं, जिसमें कई लोग घायल हुए और कई घरों को नुकसान पहुंचा। गाजा में भी हमले जारी हैं, जिससे क्षेत्र में मानवीय संकट और गहरा गया है। इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संघर्षविराम केवल कागजी राहत है, जबकि वास्तविकता में तनाव बना हुआ है।

राजनयिक स्तर पर भी स्थिति उलझी हुई है। इस्लामाबाद में बातचीत को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के नहीं पहुंचने से आंतरिक मतभेदों के संकेत मिल रहे हैं। चीन ने भी स्थिति को गंभीर बताते हुए हस्तक्षेप किया है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की मांग की है।

अब यदि अमेरिकी रक्षा विभाग की खुफिया शाखा के ताजा आकलन की बात करें, तो यह तस्वीर और जटिल हो जाती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान अब भी अपनी प्रमुख सैन्य क्षमताएं बनाए हुए है और वह एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति बना हुआ है। यह आकलन उन दावों के विपरीत है, जिनमें कहा गया था कि ईरान की सैन्य ताकत को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया गया है। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की वायु और नौसेना पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है और उसकी रणनीतिक क्षमता अभी भी प्रभावी बनी हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका के सार्वजनिक बयान और वास्तविक स्थिति में अंतर है। यह अंतर भविष्य की रणनीति और निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।

इसी बीच, एक और महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है, जिसने अमेरिका की सैन्य तैयारियों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रक्षा विश्लेषकों और पेंटागन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, ईरान के साथ सात सप्ताह तक चले संघर्ष में अमेरिका ने अपने कई महत्वपूर्ण मिसाइल भंडार का बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया है। एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका ने अपने प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल का लगभग 45 प्रतिशत, थाड इंटरसेप्टर का लगभग आधा और पैट्रियट वायु रक्षा मिसाइलों का करीब 50 प्रतिशत इस्तेमाल कर लिया है। इसके अलावा टॉमहॉक मिसाइल का लगभग 30 प्रतिशत और अन्य लंबी दूरी की मिसाइलों का भी बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के पास फिलहाल ईरान के खिलाफ अभियान जारी रखने के लिए पर्याप्त हथियार मौजूद हैं, लेकिन यदि उसे चीन जैसे किसी बड़े प्रतिद्वंद्वी के साथ संघर्ष करना पड़ा, तो मौजूदा भंडार पर्याप्त नहीं होगा। इन हथियारों को फिर से तैयार करने में एक से चार साल तक का समय लग सकता है, जबकि पूरी क्षमता हासिल करने में और ज्यादा समय लग सकता है।

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि हथियारों की इस तेजी से खपत ने पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक स्थिति को कमजोर किया है। यह स्थिति भविष्य में अमेरिका की सैन्य रणनीति के लिए चुनौती बन सकती है। हालांकि, पेंटागन ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिकी सेना के पास अपने मिशनों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। ट्रंप प्रशासन ने भी हथियारों की कमी से इंकार किया है, हालांकि अतिरिक्त बजट की मांग की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि घटते भंडार का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे यूक्रेन और अन्य सहयोगी देशों को मिलने वाली सैन्य सहायता भी प्रभावित हो सकती है। अमेरिकी संसद में भी इस मुद्दे को लेकर चिंता जताई गई है। 

इन तमाम घटनाक्रमों के बीच एक बड़ा सवाल उभरकर सामने आता है कि क्या ईरान की सैन्य ताकत के बने रहने और अमेरिकी हथियार भंडार में कमी से जुड़ी रिपोर्टों ने ही ट्रंप के फैसले को प्रभावित किया है। जब खुफिया आकलन यह संकेत दे रहे हैं कि ईरान अब भी एक मजबूत शक्ति है और दूसरी ओर अमेरिका को अपने मिसाइल भंडार को फिर से भरने में वर्षों लग सकते हैं, तो ऐसे में संघर्षविराम का ऐलान केवल कूटनीतिक कदम नहीं बल्कि एक रणनीतिक जरूरत भी हो सकता है। यह भी संभव है कि अमेरिका फिलहाल टकराव को टालकर अपनी सैन्य तैयारी को मजबूत करना चाहता हो। ऐसे में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या यह युद्धविराम वास्तव में शांति की दिशा में कदम है या फिर एक बड़े और लंबे संघर्ष से पहले की रणनीतिक विराम स्थिति है।

बहरहाल, मौजूदा स्थिति कई स्तरों पर अस्थिर बनी हुई है। एक ओर संघर्षविराम ने अस्थायी राहत दी है, लेकिन दूसरी ओर सैन्य तनाव, खुफिया आकलनों में अंतर और हथियारों की कमी से जुड़ी चिंताएं भविष्य में बड़े संकट की ओर इशारा कर रही हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं या यह संकट एक बड़े युद्ध में बदल जाता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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