By अभिनय आकाश | Jul 01, 2026
कल तक जो अजरबैजान पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर भारत के आंतरिक मामलों पर जहर उगल रहा था, आज उसकी हालत उस चूहे जैसी हो गई है जो खुद के बनाए बिल में ही फंस गया है। आज अजरबैजान को एक नहीं बल्कि दो-दो मोर्चों पर ऐसा रणनीतिक तमाचा पड़ा है कि बाकू से लेकर इस्लामाबाद तक मातम का माहौल है। एक तरफ भारत के वो कमजोर नस दबा दी है जिसे छूने की हिम्मत पिछले 100 सालों से किसी ने नहीं की थी। इजराइल की संसद और सरकार ने एक ऐसा अप्रत्याशित कदम उठाया है जिसे तुर्की और अजरबैजान के ताबूत में आखिरी कील माना जा रहा है। दरअसल इजराइली सरकार ने आधिकारिक तौर पर 1915 के अर्मेनिया नरसंहार यानी अर्मेनियन जेनोसाइड को मान्यता दे दी है। यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है दोस्तों। पिछले कई दशकों से इजराइल इस मुद्दे पर चुप था क्योंकि अजरबैजान उसका बड़ा व्यापारिक साझेदार था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑटुमन साम्राज्य यानी आज का तुर्की ने सुनियोजित तरीके से अर्मेनियाई ईसाइयों का कत्लेआम किया था। 24 अप्रैल 1915 को शुरू हुए इस खूनी खेल में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को सीरिया के तपते रेगिस्तानों में भूखा प्यासा मरने के लिए छोड़ दिया गया। तुर्की और उसका छोटा भाई यानी अजरबैजान आज तक इस सच्चाई को दुनिया से छिपाते आए हैं। लेकिन अब इजराइल, अमेरिका और रशिया और जर्मनी जैसे 32 बड़े देशों ने इसे जेनोसाइट मान लिया है। इजराइल का यह फैसला अज़र-बैजान के लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक चेकमेट है क्योंकि अब वह दुनिया के सामने नैतिक रूप से अकेला पड़ गया है। वैसे दोस्तों इस ग्लोबल शतरंज का असली खिलाड़ी तो भारत है। भारत ने अज़रान को उसकी सही जगह दिखाने के लिए साइलेंट वॉरफेयर का रास्ता चुना। साल 2020 के युद्ध में जब अजरबैजान ने तुर्की के ड्रोंस की मदद से आर्मेनिया को नुकसान पहुंचाया तब भारत ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया और आज भारत अर्मेनिया का सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद हथियार सप्लायर बन चुका है।