Lebanon पर भीषण हमलों के बीच आया इजराइली राजदूत का बड़ा बयान, बोले- ''पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है अमेरिका'

By नीरज कुमार दुबे | Apr 09, 2026

ईरान और अमेरिका के बीच घोषित संघर्षविराम के कुछ ही घंटों बाद इजराइल ने जिस तरह लेबनान पर कहर बरपाया, उसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। यह हमला स्पष्ट संदेश है कि क्षेत्र में शांति की कोई गारंटी नहीं बची है। साथ ही इजराइली सेना ने दावा किया है कि उसने हिजबुल्ला प्रमुख नईम कासिम के करीबी सहयोगी अली यूसुफ हरशी को खत्म कर दिया है। हरशी केवल एक सहयोगी नहीं था, बल्कि कासिम के दफ्तर की सुरक्षा और संचालन का अहम चेहरा माना जाता था। इसके साथ ही इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में हथियारों के ठिकानों, लॉन्चर और कमांड सेंटर पर भी बड़े पैमाने पर हमला किया।

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इजराइल के रक्षा मंत्री ने इसे अब तक का सबसे बड़ा समन्वित हमला बताया और कहा कि सैकड़ों हिजबुल्ला लड़ाकों को निशाना बनाया गया। उनका कहना है कि यह कार्रवाई हिजबुल्ला के ढांचे को पूरी तरह तोड़ने के लिए की गई। वहीं इजराइली सेना ने यह भी दावा किया कि उसने आम नागरिकों को नुकसान से बचाने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर दिख रही तबाही इन दावों को खोखला साबित करती है।

हिजबुल्ला ने इस हमले को सीधा नागरिक इलाकों पर हमला बताते हुए कड़ी निंदा की है। लेबनान के संसद अध्यक्ष नबीह बेरी ने इसे खुला युद्ध अपराध करार दिया। संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है और साफ कहा गया कि इस तरह की कार्रवाई जारी नहीं रह सकती।

इस बीच, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के संघर्ष विराम की घोषणा हो चुकी थी, तब यह हमला क्यों हुआ? हम आपको बता दें कि इस संघर्षविराम में मध्यस्थता की भूमिका निभाने का दावा कर रहे पाकिस्तान ने कहा था कि यह समझौता पूरे क्षेत्र पर लागू होगा, जिसमें लेबनान भी शामिल है। लेकिन इजराइल के प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है और हिजबुल्ला के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

यहीं से पूरा खेल पलट गया। संघर्ष विराम की स्याही सूखी भी नहीं थी कि मिसाइलें दाग दी गईं। रिपोर्ट के अनुसार महज दस मिनट में सौ से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। यह केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि ताकत का खुला प्रदर्शन था।

उधर, ईरान ने इस हमले को संघर्ष विराम का घोर उल्लंघन बताया है और इसे नरसंहार तक करार दिया। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह इजराइल की पुरानी रणनीति है पहले संघर्ष विराम मानना और फिर अचानक हमला कर देना। उन्होंने अमेरिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि वह एक साथ युद्ध और शांति दोनों नहीं चला सकता।

इस बीच, चीन ने भी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लेबनान की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह बयान बताता है कि मामला अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी खतरे की घंटी बजने लगी है। यदि यह मार्ग प्रभावित होता है तो पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।

उधर, इजराइल ने साफ संकेत दे दिया है कि उसका लक्ष्य दक्षिणी लेबनान से हिजबुल्ला को पूरी तरह खत्म करना है। उसने यह भी कहा कि जब तक यह लक्ष्य हासिल नहीं होता, तब तक कार्रवाई जारी रहेगी। दूसरी ओर लेबनान सरकार दबाव में है और अंतरराष्ट्रीय मदद की गुहार लगा रही है।

देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि मध्य पूर्व में शांति केवल कागजों तक सीमित है। जमीन पर हालात बिल्कुल अलग हैं। हर पक्ष अपनी ताकत दिखाने में लगा है और इसकी कीमत आम नागरिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो यह टकराव किसी भी वक्त बड़े युद्ध का रूप ले सकता है।

इस बीच, भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बावजूद, तेल अवीव पाकिस्तान को एक 'विश्वसनीय पक्ष' के रूप में नहीं देखता। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, “हम पाकिस्तान को एक विश्वसनीय पक्ष के रूप में नहीं देखते। मुझे लगता है कि अमेरिका ने अपने निजी स्वार्थों के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता का सहारा लिया है।'' उन्होंने कहा कि हमने अतीत में देखा है कि कैसे अमेरिका ने कतर और तुर्की जैसे समस्याग्रस्त देशों का इस्तेमाल हमास के साथ समझौता कराने के लिए किया है। इजराइली राजदूत ने कहा कि हमारे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम जो परिणाम चाहते हैं, उसके मूल सिद्धांतों और उद्देश्यों के मामले में अमेरिका के साथ तालमेल बनाए रखें।

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