By Ankit Jaiswal | Jan 13, 2026
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए बीते कुछ महीनों में हालात आसान नहीं रहे हैं। मौजूद जानकारी के अनुसार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का भरोसेमंद माना जाने वाला पीएसएलवी रॉकेट लगातार दूसरी बार अपने मिशन को पूरी तरह सफल नहीं कर पाया है, जिससे तकनीकी पारदर्शिता और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
गौरतलब है कि 18 मई 2025 को पीएसएलवी-सी61 मिशन असफल रहा था, जो वर्षों से “वर्कहॉर्स” कहे जाने वाले रॉकेट के लिए एक दुर्लभ झटका था। इसके करीब आठ महीने बाद 12 जनवरी को श्रीहरिकोटा से सुबह 10.17 बजे लॉन्च किए गए पीएसएलवी-सी62 मिशन में भी गड़बड़ी सामने आई। उड़ान के लगभग 50 मिनट बाद इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने पुष्टि की कि रॉकेट के तीसरे चरण में असामान्यता दर्ज की गई है और इसके प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा।
बता दें कि पीएसएलवी चार चरणों वाला रॉकेट है और सी61 मिशन में इसका एक्सएल संस्करण इस्तेमाल हुआ था। उस मिशन का मुख्य पेलोड ईओएस-09 उपग्रह था, जिसे हर मौसम में पृथ्वी की निगरानी, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक जरूरतों के लिए डिजाइन किया गया था। रॉकेट को करीब 529 किलोमीटर की सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा में उपग्रह स्थापित करना था, लेकिन तीसरे चरण के दौरान ईंधन दाब में अचानक गिरावट आने से मिशन को बीच में ही रोकना पड़ा और उपग्रह के साथ रॉकेट समुद्र में गिर गया।
मौजूद जानकारी के अनुसार जांच के लिए गठित विफलता विश्लेषण समिति ने संकेत दिया कि समस्या पीएस3 ठोस ईंधन मोटर प्रणाली में हो सकती है। आशंका जताई गई कि नोज़ल या केसिंग से जुड़ी संरचनात्मक या सामग्री संबंधी खामी के कारण दाब नियंत्रित नहीं रह सका है। हालांकि, समिति की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है क्योंकि यह सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट को गोपनीय रखने के पीछे व्यावसायिक कारण भी हो सकते हैं। गौरतलब है कि इसरो पीएसएलवी को एक व्यावसायिक लॉन्च वाहन के रूप में बढ़ावा दे रहा है और ठोस ईंधन वाला तीसरा चरण तकनीकी रूप से परिपक्व माना जाता है। ऐसे में यहां विफलता सामने आना डिजाइन से ज्यादा निर्माण या गुणवत्ता जांच में चूक की ओर इशारा करता है, जिसे खुले तौर पर स्वीकार करना बीमा लागत और बाज़ार की विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है।
पीएसएलवी-सी62 मिशन के संदर्भ में इसरो प्रमुख ने बताया कि तीसरे चरण में रोल रेट डिस्टर्बेंस देखा गया, जिससे रॉकेट की उड़ान दिशा प्रभावित हुई। आसान शब्दों में कहें तो रॉकेट अपने अक्ष पर अनियंत्रित रूप से घूमने लगा, जिससे नेविगेशन सिस्टम भ्रमित हुआ और ऊपरी चरण के छोटे नियंत्रण थ्रस्टर स्थिति संभाल नहीं पाए।
कुल मिलाकर, चाहे सटीक तकनीकी कारण कुछ भी रहे हों, लगातार दो मिशनों में तीसरे चरण से जुड़ी समस्याएं यह संकेत देती हैं कि दोनों घटनाएं एक-दूसरे से असंबंधित नहीं हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सी61 की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न होने से बाहरी तकनीकी समीक्षा का अवसर नहीं मिला, और संभव है कि वापसी से पहले किए गए सुधार पर्याप्त न रहे हों।
मौजूदा हालात में सबसे बड़ी चिंता यही है कि एक बड़े असफल मिशन के आठ महीने बाद बिना पूरी पारदर्शिता के अगला प्रक्षेपण किया गया है, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की विश्वसनीयता और निजीकरण की कोशिशों पर असर डाल सकता है।