By एकता | Oct 04, 2026
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों और उनके बढ़ते असर के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था में तेजी से हो रहे बदलावों पर बात की है। 62वें म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि इस बदलाव के पीछे अमेरिका की विदेश नीति में आया परिवर्तन और चीन का लगातार बढ़ता प्रभाव प्रमुख कारण हैं।
विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का असर अब केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है। दुनिया के दूसरे देश भी बदलते माहौल के अनुसार अपनी रणनीति नए सिरे से तय कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक तरफ देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ आपसी निर्भरता भी बनी हुई है।
जयशंकर ने चीन की आर्थिक क्षमता का जिक्र करते हुए कहा कि वैश्विक विनिर्माण में उसकी करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी है। उनके मुताबिक, चीन की आर्थिक ताकत अब वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर रही है।
जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियां अब अपने हितों को लेकर पहले से ज्यादा सजग हैं। ये देश अपनी क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने भारत में इस्तेमाल होने वाले ‘आत्मनिर्भर’ शब्द का उदाहरण देते हुए कहा कि कई देश इसी तरह अपनी क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि देश सप्लाई चेन और रणनीतिक क्षेत्रों में जोखिम कम करने के लिए डी-रिस्किंग और डायवर्सिफिकेशन की नीति अपना रहे हैं। इसके तहत किसी एक देश या व्यवस्था पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग विकल्प तैयार किए जा रहे हैं।
जयशंकर ने कहा कि देशों के बीच सहयोग के लिए हर मुद्दे पर पूरी तरह एक जैसी सोच होना जरूरी नहीं है। अगर कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर साझा हित मौजूद हैं, तो देश उन क्षेत्रों में मिलकर काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज की वैश्विक राजनीति में लचीली साझेदारियां तेजी से महत्वपूर्ण हो रही हैं।
विदेश मंत्री ने ‘इमर्जिंग पावर्स’ और ‘मिडिल पावर्स’ की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि किसी देश को ‘मिडिल पावर’ मानने का आधार सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं हो सकता।
जयशंकर के मुताबिक, इस शब्द को बहुत शाब्दिक अर्थ में लेने के बजाय किसी देश की किसी खास क्षेत्र में मौजूद क्षमता और प्रभाव को भी देखना चाहिए।
उन्होंने नीदरलैंड का उदाहरण देते हुए कहा कि कोई देश G20 का हिस्सा नहीं होने के बावजूद किसी खास क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में नीदरलैंड की भूमिका का उल्लेख किया।
इसी तरह UAE का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कुछ देश अपनी क्षमता और आकार की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इसलिए उभरती और मध्यम शक्तियों को लेकर लचीला और व्यापक नजरिया अपनाने की जरूरत है।
जयशंकर ने BRICS का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग देश कई बार इसलिए साथ आते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी सामूहिक आवाज व्यक्तिगत रूप से कहीं ज्यादा मजबूत हो सकती है।
उन्होंने कहा, “BRICS विभिन्न पक्षों का ऐसा उदाहरण है, जिन्हें आज लगता है कि उनकी सामूहिक आवाज अकेले देशों की आवाज से कहीं अधिक मजबूत है।”
जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था के उदाहरण के तौर पर क्वाड, BRICS के साथ-साथ इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC), इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC), नॉर्दर्न सी रूट, इंटरनेशनल सोलर अलायंस और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) का भी उल्लेख किया।
म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री ने भारत-रूस संबंधों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते 1950 के दशक से ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं।
जयशंकर ने कहा कि जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा था, तब सोवियत संघ और बाद में रूस ने भारत का साथ दिया। उन्होंने कहा कि आज भारत-रूस संबंध सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं हैं। इनमें व्यापार, निवेश, ऊर्जा, संसाधन, परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं। उनके मुताबिक, रूस के साथ भारत का संबंधों का अनुभव लगातार सकारात्मक रहा है।
यूक्रेन संघर्ष पर जयशंकर ने कहा कि भारत का रुख स्पष्ट है कि संघर्ष का अंत होना चाहिए और इसके लिए बातचीत व कूटनीति जरूरी है। उन्होंने बताया कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है और समाधान की दिशा में मदद करने की कोशिश कर रहा है।