By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | May 28, 2022
अधिवेशन में ‘इस्लामोफ़ोबिया’ को लेकर भी प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया है कि ‘इस्लामोफ़ोबिया’ सिर्फ धर्म के नाम पर शत्रुता ही नहीं, बल्कि इस्लाम के खिलाफ़ भय और नफ़रत को दिल व दिमाग़ पर हावी करने की मुहिम है। इसमें आरोप लगाया गया है, इसके कारण आज हमारे देश को धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक इंतहापसंदी (अतिवाद) का सामना करना पड़ रहा है। एक अन्य प्रस्ताव में दावा किया गया है, ‘‘देश धार्मिक बैर और नफ़रत की आग में जल रहा है। चाहे वह किसी का पहनावा हो, खान-पान हो, आस्था हो, किसी का त्योहार हो, बोली हो या रोज़गार, देशवासियों को एक दूसरे के खि़लाफ़ उकसाने और खड़ा करने के दुष्प्रयास हो रहे हैं।’ प्रस्ताव के मुताबिक, सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि सांप्रदायिकता की यह ‘काली आंधी’ मौजूदा सत्ता दल व सरकारों के संरक्षण में चल रही है जिसने बहुसंख्यक वर्ग के दिमागों में ज़हर भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। इसमें आरोप लगाया है, आज देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथों में आ गई है जो देश की सदियों पुरानी भाईचारे की पहचान को बदल देना चाहते हैं। इसमें कहा गया है कि मुस्लिमों, पुराने ज़माने के मुस्लिम शासकों और इस्लामी सभ्यता व संस्कृति के खि़लाफ़ भद्दे और निराधार आरोपों को ज़ोरों से फैलाया जा रहा है।