फीस बढोत्तरी पर विरोध कैसे जताते हैं ये JNU के छात्रों को IIMC से सीखना चाहिए

By अभिनय आकाश | Dec 06, 2019

आए दिन किसी न किसी जायज या नाजायज गतिविधि के कारण सुर्ख़ियों में रहने वाला देश के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र बीते दिनों फीस वृद्धि को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करते दिख रहे थे। जेएनयू में अचानक से हॉस्टल की फीस हजारों रुपए बढ़ा दी गई तो उन्होंने वीसी से कहा मत कीजिए, हम पढ़ नहीं पाएंगे। कोई सुनवाई नहीं हुई। नतीजा, वो संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन सड़कों पर उतर आए। इस मामले को लेकर प्रदर्शनकारी छात्रों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई। रक्षाबलों की भारी तैनाती के बावजूद उनहोंने चारों बैरिकेड तोड़ दिए। सड़क की दुकान को छात्रों ने सभा में तब्दील कर दिया था। छात्रों के इस प्रदर्शन से दिल्ली की सड़के जाम रही और मेट्रो के भी कई स्टेशन बंद करने पड़े। लेकिन ये छात्र फीस बढ़ाने के लिए प्रदर्शन करते रहे और संसद तक पहुंचने की जद्दोजहद में जमकर बवाल भी काटा। जिसका साक्षी दिल्ली के साथ मीडिया के जरिए पूरा देश भी बना। लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से महज कुछ ही दूरी पर स्थित एक स्वायत्त संस्था है जहां पिछले तीन सालों में फीस तकरीबन 50 फीसदी तक बढ़ा दी गई है और जिसको लेकर छात्र प्रदर्शन भी कर रहे हैं लेकिन देश-दिल्ली का ध्यान आर्कषित करने में नाकाम रहे, क्योंकि उनके प्रदर्शन में गुस्सा तो था लेकिन सांकेतिक आक्रामक नहीं। विरोध के स्वर में बगावत की बानगी नहीं।

आइए अब आपको बताते हैं उस स्वायत्त संस्था के बारे में जिसका नाम है इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी)। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था है। आईआईएमसी की स्थापना साल 1965 में हुई थी। संस्थान का उद्घाटन 17 अगस्त 1965 को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने किया था। आईआईएमसी में फीस साल दर साल बढ़ाई जा रही है। पिछले तीन सालों में ये फीस तकरीबन 50 फीसदी तक बढ़ा दी गई है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन (आईआईएमसी) के स्टूडेंट्स फीस बढ़ोतरी के मसले पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। स्टूडेंट्स का कहना है कि सरकारी इंस्टिट्यूट होने के बावजूद हर साल ट्यूशन फीस, हॉस्टल और मेस चार्ज बढ़ा रहा है। हालांकि, बुधवार को इंस्टिट्यूट में स्टूडेंट्स के साथ एक मीटिंग रखी गई जिसमें टीचर्स शामिल हुए। प्रशासन ने एग्जिक्यूटिव काउंसिल कमिटी बना दी है, जिसमें कोर्स डायरेक्टर्स, फैकल्टी के अलावा स्टूडेंट्स को रखने की भी बात की गई है। कमिटी स्टूडेंट्स की शिकायतें सुनेगी। स्टूडेंट्स का कहना है कि सिर्फ आश्वासन मिला इसलिए प्रदर्शन जारी रहेगा। मंगलवार की तरह रातभर स्टूडेंट्स धरना देंगे। उनकी मांग है कि जब तक कमिटी की रिपोर्ट नहीं आती, फीस देने की डेडलाइन 15 जनवरी को रद्द किया जाए।

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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आईआईएमसी के स्टूडेंट्स का कहना है कि पिछले 3 साल में उनकी फीस में 50% की बढ़ोतरी हुई है। इस साल भी हमारी फीस बढ़ाई गई है और हम तब से प्रशासन से इस पर बात कर रहे हैं मगर कोई नहीं सुन रहा है। मजबूरन हमें यह प्रदर्शन करना पड़ रहा है। हमारे साथ के कई स्टूडेंट्स ऐसे घरों से हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। कुछ स्टूडेंट्स के परिवारों ने तो जमीन बेचकर फीस का इंतजाम किया है। फीस के अलावा, लड़कियों के लिए हॉस्टल और मेस का चार्ज लगभग 6500 रुपये और लड़कों के लिए 5250 रुपये हर महीना है। लड़कों के लिए तो हॉस्टल की भी किल्लत है। उन्हें बाहर रेंट पर रहना पड़ता है। इस सेशन रेडियो और टीवी पत्रकारिता की सालाना फीस सबसे ज्यादा 1,68,500 रुपये तक पहुंच गई है।, 2017-18 में ये फीस 1,32000 थी। हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता के लिए 95,500 रुपये और उर्दू पत्रकारिता 55,500 रुपये तय की गई है। इंग्लिश जर्नलिजम की स्टूडेंट आस्था सब्यसाची का कहना है, दस महीने के कोर्स के लिए 1,68,500 से ज्यादा फीस और हॉस्टल-मेस चार्ज अलग से देने पड़ रहे हैं। इंस्टिट्यूट में कई ऐसे स्टूडेंट हैं, जिन्हें पहले सेमेस्टर के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी। रेडियो और टीवी पत्रकारिता के स्टूडेंट हृषिकेश का कहना है, एक हफ्ते से हम संस्थान के साथ बातचीत कर हल निकालने की कोशिश में हैं मगर सिर्फ आश्वासन मिला। 

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पढ़ाई और दवाई हरेक इंसान की सबसे बड़ी बुनियादी जरूरत है और हर सरकार को इस दिशा में काम करने की जरूरत है। भारत एक विकासशील देश है यानी अभी भी हम विकसित होने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के छात्रों को नई दिशा और नए सोच की जरूरत है। लेकिन सोच और जोश के साथ होश के होने की भी आवश्यकता है। बहरहाल, कैंपस में रहकर ही विरोध को सड़क और संसद तक न लाकर आईआईएमसी के छात्रों ने एक तरह से यह बताने की कोशिश की कि शिक्षा के अधिकार की मांग और राजनीति दो अलग चीज है और इसे प्रदर्शनी बनाए बिना भी विरोध किया जा सकता है। 

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