भाषा और रिश्ते (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Oct 12, 2018

पश्चिम में तो परिवार-व्यवस्था टूट गयी है। परिवार का अर्थ पति-पत्नी और एक बच्चा; और वह भी छात्रावास में। वहां यह कल्पना भी कठिन है कि दो सगे भाईयों के परिवार साथ-साथ रहेंगे; पर भारत में आज भी संयुक्त परिवार व्यवस्था जीवित है।

 

विजय कुमार

 

परसों बहुत समय बाद रमेश के घर गया। चाय-पानी के बीच उसने अपने बेटे को बुलाया, ‘‘राहुल, अंकल को नमस्ते करो।’’ 

 

राहुल ने मुझे अंकल जी नमस्ते कहा। मैंने कहा कि मैं तुम्हारा अंकल नहीं ताऊ हूं। वह हैरान हो गया, ‘‘ताऊजी क्या होता है अंकल ?’’

 

- तुम्हारे पापा के बड़े भाई सुरेश जी हैं न, वे तुम्हारे क्या हैं ?

 

- वे तो बड़े पापा हैं।

 

- और महेश जी ?

 

- वे छोटे पापा हैं।

 

मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। अंग्रेजी सभ्यता ने हमें कुछ दिया या नहीं; पर उसने हमारे नाते-रिश्ते जरूर बदल दिये हैं। मैंने कहा, ‘‘अच्छा दादी जी को बुला लाओ।’’ 

 

- दादी जी कौन ?

 

- तुम्हारे पिताजी की माताजी..।

 

- अच्छा; सबसे बड़ी मम्मी.. ?

 

अब और कुछ कहना व्यर्थ था। मैं समझ गया कि वह दादा जी को सबसे बड़े पापा कहेगा। वाह री अंग्रेजी शिक्षा; तूने हमसे रिश्तेदारियां ही छीन ली हैं। 

 

पश्चिम में तो परिवार-व्यवस्था टूट गयी है। परिवार का अर्थ पति-पत्नी और एक बच्चा; और वह भी छात्रावास में। वहां यह कल्पना भी कठिन है कि दो सगे भाईयों के परिवार साथ-साथ रहेंगे; पर भारत में आज भी संयुक्त परिवार व्यवस्था जीवित है। ऐसे में चाचा-ताऊ, दादा-दादी, मामा-मामी, नाना-नानी के होते हुए हम उन्हें दफनाने पर क्यों तुले हैं ?  

 

अंग्रेजी में शब्दों का अभाव है। इसलिए उन्होंने अंकल, आंटी, ग्रैंड मदर, मदर एवं फादर इन लॉ, ब्रदर एवं सिस्टर इन लॉ में सबको समेट दिया; पर भारतीय भाषाओं में तो शब्दों का अभाव नहीं है। फिर हम अपनी विरासत के प्रति मन में हीन भाव क्यों रखते हैं ?

 

मेरे एक सिन्धी मित्र अमरीका में बस गये हैं। उनके बच्चों का जन्म भी वहीं हुआ; पर जब वे भारत आते हैं, तो मैं उन सबको बहुत अच्छी सिन्धी बोलते सुनता हूं। असल में वे बाहर चाहे कुछ भी बोलें; पर घर में सिन्धी में ही बात करेंगे। उनके घर के बाहर अमरीका है; पर घर के अंदर भारत और सिन्ध। उनका कहना है कि विभाजन के बाद पंजाब और बंगाल वालों को आधा प्रान्त तो मिल गया; पर हमारा तो पूरा क्षेत्र ही पाकिस्तान में रह गया। यदि हम भाषा भी छोड़ देंगे, तो हमारे पास अपना रह ही क्या जाएगा ?  

 

छोटे परिवार के कारण चाचा, ताऊ और मौसी जैसे रिश्ते समाप्त होने लगे हैं; पर यदि भाषा जीवित रही, तो अपने संबंध और संबंधी भी जीवित रहेंगे। वरना चार-छह पीढ़ी बाद लोग भूल जाएंगे कि चाचा, मामा आदि भी कभी होते थे। इसलिए हम बच्चों को यह सिखा सकते हैं कि वे घर आने वालों को उनकी आयु के अनुसार चाचा, ताऊ, बाबा, दादी तथा अपने ननिहाल की ओर संबंध रखने वालों को मामा, मौसी आदि से सम्बोधित करें। कभी-कभी तो बच्चे 70 साल के बुजुर्ग और उनके 25 साल के पोते, दोनों को ही अंकल कहते हैं।

 

आप बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं, तो ये आपकी मर्जी; लेकिन घर पर तो उन्हें अपनी भाषा-बोली द्वारा भारतीयता के संस्कार दें।

 

-विजय कुमार

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