जज साहब ने बात तो सही कही है लेकिन आज सच बोलने की हिम्मत किसमें है?

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Aug 31, 2021

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाय. चंद्रचूड़ ने सत्यनिष्ठता की जबर्दस्त वकालत की है। वे छागला स्मारक भाषण दे रहे थे। उनका कहना है कि यदि राज्य या शासन के आगे सत्य को झुकना पड़े तो सच्चे लोकतंत्र का चलना असंभव है। राज्य और शासन प्रायः झूठ फैलाकर ही अपना दबदबा बनाए रखते हैं। बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे उस झूठ, उस पाखंड, उस नौटंकी का भांडाफोड़ करें। मेरी राय में यह जिम्मेदारी सिर्फ बुद्धिजीवियों की ही नहीं है। उनके पहले विधानपालिका याने संसद और न्यायपालिका याने अदालतों की है। जिन देशों में तानाशाही या राजतंत्र होता है, वहां संसद और अदालतें सिर्फ रबर का ठप्पा बनकर रह जाती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक देशों की अदालतों और संसद में सरकारों के झूठ के विरुद्ध सदा खांडा खड़कता रहता है। लेकिन हमने देखा है कि विधानपालिका और न्यायपालिका भी कार्यपालिका की कैसी गुलामी करती हैं।

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अखबारों की स्थिति कहीं बेहतर है लेकिन वे भी अपनी वित्तीय सीमाओं से लाचार हैं। वे यदि बिल्कुल खरी-खरी लिखने लगें तो उनका छपना ही बंद हो सकता है। फिर भी कई अखबार और पत्रकार तथा कुछ टीवी एंकर भारत के लोकतंत्र की शान हैं। उनकी निष्पक्षता और सत्यनिष्ठता हमारी सरकारों पर अंकुश का काम तो करती ही हैं, उनका मार्गदर्शन भी करती है। सत्य बोलने की हिम्मत जिनमें है, वे नेता, वे जज और वे पत्रकार हमारे लोकतंत्र के सच्चे रक्षक हैं।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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