आजाद भारत के वो न्‍यायिक फैसले, जिन्‍होंने महिलाओं का इतिहास बदल दिया

आजाद भारत के वो न्‍यायिक फैसले, जिन्‍होंने महिलाओं का इतिहास बदल दिया

कार्यस्थल, घर और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के अधिकारों की जब भी बात होती है या उनके हक हकूक को बुलंद करने की रवायत देश की सर्वोच्च अदालत अपने फैसले से नित नए नजीर पेश करता रहता है। अदालत अपने फैसले से नित नए नजीर पेश करता रहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों एनडीए से जुड़ा एक फैसला दिया। मोदी जी वाला वो एनडीए नहीं जिसकी सरकार है। बल्कि वो एनडीए जो देश के सैनिकों को तैयार करने का काम करता है। यानी नेशनल डिफेंस अकादमी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लड़कियां भी एनडीए का एग्जाम दे सकती हैं। हालांकि ये कोर्ट का अंतरिम फैसला है लेकिन फिर भी ये अपने आप में बहुत अहम है। कार्यस्थल, घर और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के अधिकारों की जब भी बात होती है या उनके हक हकूक को बुलंद करने की रवायत देश की सर्वोच्च अदालत अपने फैसले से नित नए नजीर पेश करता रहता है। भारत के शीर्ष न्यायालय ने बार-बार महिलाओं के अधिकारों की हिमायत की है। आज हम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए शीर्ष अदालत द्वारा लिए गए कुछ प्रमुख फैसलों के बारे में इस रिपोर्ट के जरिये बताएंगे। 

बेटियों के अधिकार: अगस्त 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने बेटी को भी पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटियों को भी बेटों के समान ही हिस्सा मिलेगा। तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही पिता का निधन हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 लागू होने से पहले हो गई हो, फिर भी बेटियों का माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार होगा। 

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कार्यस्थल पर सुरक्षा: 1997 में, विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के मामले में, अदालत ने नियोक्ताओं के लिए उनकी महिला कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण के लिए एक तंत्र के लिए दिशानिर्देश तैयार किए।  ‘विशाखा बनाम राजस्थान राज्य’ मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘ऐसा कोई भी अप्रिय हाव-भाव, व्यवहार, शब्द या कोई पहल जो यौन प्रकृति की हो, उसे यौन उत्पीड़न माना जाएगा। बाद में, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम भी 2013 में पारित किया गया था।

ट्रिपल तलाक: 2017 में शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में शीर्ष अदालत ने माना कि तीन तलाक की प्रथा - जिसके तहत एक मुस्लिम व्यक्ति तीन बार तलाक बोलकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है - कुरान का हिस्सा नहीं था। अदालत ने कहा कि प्रथा (तलाक बिदा) इस्लाम और कुरान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इस तरह इस पर प्रतिबंध लगा दिया।

परमानेंट कमीशन: रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता पुनिया के मामले में 2020 के फैसले में अदालत ने महिलाओं को रक्षा बलों की कमांडिंग भूमिकाओं में स्थायी कमीशन के लिए पात्र बनाया। 17 फरवरी 2020 को आमर्ड फोर्सेज में महिलाओं के साथ भेदभाव को खत्म करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि सभी महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन मिलेगा और उनके लिए कमांड पोजीशन का रास्ता भी साफ कर दिया था। 

लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006): सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी करार दिया। शीर्ष अदालत ने घोषित किया कि एक पुरुष और एक महिला के लिए एक साथ रहना उनके जीवन के अधिकार का हिस्सा है और यह एक "अपराध" की श्रेणी में नहीं आता है, भले ही इसे समाज के एक वर्ग द्वारा अनैतिक के रूप में देखा जा सकता है। लता सिंह एक वयस्‍क महिला थीं, जिन्‍होंने अपनी मर्जी से एक दलित व्‍यक्ति से विवाह किया। इस रिश्‍ते से नाखुश लता के परिवार वालों ने लता के पति पर उसे बरगलाने और उसका अपहरण करने का आरोप लगाया। पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस और लता के परिवार द्वारा लगाए गए इन आरोपों के खिलाफ लता ने न्‍यायालय में पिटीशन दायर किया, जिसका नतीजा एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में हुआ।

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बुद्धदेव कर्मस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2011): सर्वोच्च न्यायालय यौनकर्मियों के अधिकारों के लिए एक अहम फैसला दिया। यह मानते हुए कि उन्हें भी भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। इसने निर्देश दिया कि केंद्र और राज्य सरकारें सामाजिक कल्याण बोर्डों के माध्यम से शारीरिक और यौन शोषण वाली महिलाओं के लिए पूरे देश में पुनर्वास के लिए योजनाएं तैयार करें।

लक्ष्मी बनाम भारत संघ (2014): भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2015 को सभी निजी अस्पतालों को यह निर्देश जारी किया कि वे एसिड अटैक हमले के शिकार लोगों का मुफ्त एवं पूरा इलाज करेंगे। यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर जनहित याचिका (पीआईएल) लक्ष्मी बनाम संघ के अंतर्गत न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर एवं यूयू ललित वाली बेंच द्वारा दिया गया।  फैसले ने आपराधिक कानून में संशोधन किया, एसिड हमले को एक विशिष्ट अपराध बना दिया और पीड़ितों के लिए पीड़ित मुआवजा योजना तैयार की।

एबीसी बनाम एनसीटी दिल्ली (2015): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एक अविवाहित मां को पिता की सहमति के बिना अपने बच्चे का एकमात्र कानूनी अभिभावक नियुक्त किया जा सकता है। अदालत ने माना कि पिता की पहचान का खुलासा करने के लिए मां की आवश्यकता नहीं है और उसे कुछ मामलों में संरक्षकता याचिका में एक पक्ष के रूप में शामिल किया गया है। एबीसी बनाम राज्य (एनसीटी ऑफ दिल्ली)(2015) 10 एससीसी 1 और मथुमिता रमेश बनाम मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी व अन्य (2018 एससीसी ऑनलाइन एमएडी 2153) का हवाला देते हुए कहा गया कि एकल मां के अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा भी मान्यता दी गई है।

जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018): सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक ठहराया है, जिसके तहत व्यभिचार (एडल्ट्री) आपराधिक था। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पीठ ने सर्वसम्मति से गुरुवार को कहा कि व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया।

ए बनाम बी (2020): "किसी भी समाज की प्रगति उसकी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और बढ़ावा देने की क्षमता पर निर्भर करती है," सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि एक महिला "साझा घर" में निवास के अधिकार का दावा करने की हकदार है। "जहां वह अपने पति के साथ रह रही है, भले ही उक्त परिसर उसके रिश्तेदारों का हो। 





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