By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Sep 02, 2022
सर्वोच्च न्यायालय ने यू.यू. ललित के मुख्य न्यायाधीश बनते ही कैसे दनादन फैसले शुरू कर दिए हैं, यह अपने आप में एक मिसाल है। ऐसा लगता है कि अपने ढाई माह के छोटे से कार्यकाल में वे हमारे सारे न्यायालयों को शायद नए ढांचे में ढाल जाएंगे। इस समय देश की अदालतों में 4 करोड़ से ज्यादा मुकदमे लटके पड़े हुए हैं। कई मुकदमे तो लगभग 30-40 साल से घसिट रहे हैं। मुकदमों में फंसे लोगों की जबर्दस्त ठगाई होती है, उसकी कहानी अलग है ही। न्यायमूर्ति ललित की अदालत ने गुजरात के दंगों की 11 याचिकाओं, बाबरी मस्जिद से संबंधित मुकदमों और बेंगलुरु के ईदगाह मैदान के मामले में जो तड़ातड़ फैसले दिए हैं, उनसे आप सहमति व्यक्त करें, यह जरूरी नहीं है लेकिन उन्हें दशकों तक लटकाए रखना तो बिल्कुल निरर्थक ही है।
ललित की अदालत में अभी तीन महत्वपूर्ण मुकदमे भी आने वाले हैं। इन तीनों मामलों में उनके फैसले युगांतरकारी हो सकते हैं। पहला मामला है- गरीबों और मुसलमानों को आरक्षण देने के विरुद्ध ! मैं मानता हूं कि गरीबी, जाति और धर्म के आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण देना बिल्कुल गलत है, अनैतिक है और देश को तोड़ने वाला है। आरक्षण सिर्फ शिक्षा में दिया जा सकता है, वह भी सिर्फ गरीबी के आधार पर। नौकरियां शुद्ध गुणवत्ता के आधार पर दी जानी चाहिए। जहां तक दूसरे मामले- मुस्लिम बहुविवाह और निकाह हलाला का सवाल है, तीन तलाक की तरह इस पर भी कानूनी प्रतिबंध होना चाहिए। भारत के मुसलमानों को पीछेदेखू नहीं, आगेदेखू बनना है।
तीसरा मामला है, राज्यों में अल्पसंख्यकों की पहचान का। यदि भारतीय संविधान के अनुसार यदि सभी भारतीय नागरिक एक समान हैं, तो किसी राज्य में उनकी संख्या के आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का तमगा उनके चेहरे पर चिपका देना उचित नहीं है। यह ठीक है कि ऐसा कर देने से थोक वोट की राजनीति का धंधा बड़े मजे से चल सकता है लेकिन न तो यह भारत की एकता के हिसाब से ठीक है और न ही स्वतंत्र लोकतंत्र के लिए लाभदायक है। यदि अगले दो-ढाई माह की अवधि में सर्वोच्च न्यायालय जरा हिम्मत दिखाए और इन मसलों पर अपने निष्पक्ष और निर्भय फैसले दे सके तो देश के लोगों को लगेगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के लोकतंत्र की रक्षा के लिए अद्भुत पहल की है।
-डॉ. वेदप्रताप वैदिक