फिल्म जगत में कैफी आजमी ने उर्दू साहित्य का लहराया था परचम

By अनुराग गुप्ता | Jan 14, 2020

प्रसिद्ध भारतीय कवि और गीतकार कैफी आजमी की आज 101वीं जयंती है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में जन्मे कैफी आजमी का असल नाम अख्तर हुसैन रिजवी था। 14 जनवरी को जन्मे कैफी को गांव के माहौल में शायरी और कविताएं पढ़ने का काफी शौक हुआ करता था और शुरुआत भी उनकी यहीं गांव से ही हुई थी। जब उनके भाइयों ने थोड़ा हौसला अफजाई की तो कैफी लिखने भी लगे और इसी का नतीजा था कि कैफी ने महज 11 साल की उम्र में अपनी पहली रचना गजल के स्वरूप में लिखी थी। 

महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से कैफी आजमी काफी प्रेरित हुए थे और उसके चलते ही कैफी आजमी उर्दू अखबार में लिखने के लिए वह मुंबई चले गए। कैफी आजमी ने फिल्म इंडस्ट्री में उर्दू साहित्य को काफी बढ़ावा दिया। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कैफी आजमी के काफी गीत प्रसिद्ध हुए। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं उर्दू भाषा और हिंदी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के रूप में याद की जाती हैं।

कैफी आजमी को कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्हें 3 फिल्मफेयर अवार्ड, साहित्य और शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार भी मिल चुका है।

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10 मई 2002 के दिन दुनिया को अलविदा कहते हुए कैफी साहब ने लोगों के आखों में आंसू ला दिए। उनके चाहने वालों का चमन उदास हो गया। सुर्ख और लाल हो गया। बेबस और लाचार लोगों के प्रति उनकी संवेदनाएं उनकी रचनाओं में झलकती हैं। ऐसा शायद ही कोई घटनाक्रम हो जिसके बारे में उन्होंने लिखा न हो! हालांकि, कैफी साहब की बागी रचनाओं और शेरों को लोगों ने काफी चाहा। जबकि उन्होंने हर तरह से लिखा था। कैफी साहब ने प्रसिद्ध गीत भी लिखें...जिसको सुनकर, गुनगुना कर देशभक्ति रोम-रोम में झलकने लगती है- कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों... हालांकि कैफी आजमी ने अपना पहला गीत 1951 में लिखा था। फिल्म थी बुझदिल। गीत के बोल थे- रोते-रोते बदल गई रात। उनकी प्रमुख रचनाओं में आवारा सज़दे, इंकार, आख़िरे-शब इत्यादि प्रमुख हैं।

यहां पढ़ें उनके मशहूर शेर:

1

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं 

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।

2

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो 

डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ।

3

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ 

यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता।

4

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए 

इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए। 

वो अपनी नज़्म 'एक लम्हा' में लिखते हैं कि-  

जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को

सौ चराग़ अँधेरे में झिलमिलाने लगते हैं।

ख़ुश्क ख़ुश्क होंटों में जैसे दिल खिंच आता है

दिल में कितने आईने थरथराने लगते हैं।

फूल क्या शगूफ़े क्या चाँद क्या सितारे क्या

सब रक़ीब क़दमों पर सर झुकाने लगते हैं।

ज़ेहन जाग उठता है रूह जाग उठती है

नक़्श आदमियत के जगमगाने लगते हैं।

लौ निकलने लगती है मंदिरों के सीने से

देवता फ़ज़ाओं में मुस्कुराने लगते हैं।

रक़्स करने लगती हैं... मूरतें अजंता की

मुद्दतों के लब-बस्ता ग़ार गाने लगते हैं।

फूल खिलने लगते हैं... उजड़े उजड़े गुलशन में

तिश्ना तिश्ना गीती पर अब्र छाने लगते हैं।

लम्हा भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है

लम्हा भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं।

- अनुराग गुप्ता

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