Kasturba Gandhi birth anniversary: साए की तरह हमेशा गांधी जी के साथ रही उनकी पत्नी कस्तूरबा मोहनदास गांधी, पति के सामने ली थी अंतिम सांस

By निधि अविनाश | Apr 11, 2022

कस्तूरबा कपाड़िया जिनका शादी के बाद पूरा नाम कस्तूरबा मोहनदास गांधी हुआ मोहनदास करमचंद गांधी की पत्नी थी।कस्तूरबा का जन्म 11 अप्रैल 1869 में पोरबंदर में हुआ था। कस्तूरबा का जन्म एक धनी व्यापारी गोकुलदास कपाड़िया और उनकी पत्नी व्रजकुंवरबा के घर हुआ था। उनका परिवार और मोहनदास गांधी दोस्त थे और 1882 में जब कस्तूरबा 13 साल की हुई तो गांधी और कस्तूरबा की शादी करा दी गई। वह राजकोट में गांधी के घर में रहने लगी। बता दें कि कस्तूरबा ने अपनी शादी से पहले कोई स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की थी और गांधी जी ने उन्हें प्रारंभिक शिक्षा प्रदान की।

 

कस्तूरबा पहली बार दक्षिण अफ्रीका में राजनीति और सामाजिक सक्रियता में शामिल हुईं। 1904 में उन्होंने मोहनदास और अन्य लोगों को डरबन के पास फिनिक्स सेटलमेंट स्थापिता करने में मदद की। 1913 में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय प्रवासियों के साथ हो रहे दुर्व्यव्हार के विरोध में भाग लेने के लिए कस्तूरबा को गिरफ्तार किया गया और वह तीन महीने की जेल की सजा सुनाई गई। परिवार ने जुलाई 1914 में अंतिम बार दक्षिण अफ्रीका छोड़ दिया और 1915 की शुरूआत में भारत आने से पहले इंग्लैंड की यात्रा की। कस्तूरबा को दक्षिण अफ्रीका में स्वास्थ्य समस्याएं भी हुई। दृढ़-इच्छाशक्ति कस्तूरबा और गांधी समेत कई अन्यों ने पूरे भारत में नागरिक कारवाईयों और विरोध प्रदर्शनों की बढ़ती संख्या में भाग लेना जारी रखा। जब गांधी जी जेल गए तब उनकी जगह कस्तूरबा होती थी। कभी-कभी वह गांधी की इच्छा के विरोध में भी कई गतिविधियां करती थी और गांधी जी इस बीच कस्तूरबा के स्वास्थ्य को लेकर काफी चिंतित थे। 1917 में जब गांधी जी बिहार के चंपारण में नील किसानों की स्थिति में सुधार के लिए काम कर रहे थे तब कस्तूरबा महिलाों के कल्याण के लिए लड़ रही थी। 1922 में उन्होंने गुजरात के बोरसाड में एक अहिंसक सविनय अवज्ञा जिसे सत्याग्रह आंदोलन भी कहा जाता है में भाग लिया। हालांकि, उन्होंने 1930 में गांधी के प्रसिद्ध नमक मार्च में भाग नहीं लिया, लेकिन उन्होंने 1930 के दशक की शुरूआतो में कई सविनय अवज्ञा अभियानों में भाग लिया और इस दौरान वह कई बार जेल भी गई।

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1939 की शुरूआत में कस्तूरबा राजकोट में अग्रेंजो के खिलाफ अहिंसक विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार कर शहर के पास एक महीने के लिए कारावास में रखा गया। बता दें कि इस दौरान ही कस्तूरबा गांधी की तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी। 1942 में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए एक बार फिर से गिरफ्तार किया गया और पुणे में आगा खान पैलेस में गांधी और अन्य कई  स्वतंत्रता-समर्थक नेताओं के साथ कैद कर दिया गया। जेल में रहते हुए कस्तूरबा की हालत बिगड़ गई और उन्हें निमोनिया हो गया। साल 1944 की शुरूआत में निधन होने से पहले कस्तूरबा को दिल के दौरे का भी सामना करना पड़ा था और इस बीच 22 फरवरी 1944 को पुणे में उनकी मौत हो गई।

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