By नीरज कुमार दुबे | Aug 10, 2022
एक कहावत है कि करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान।। यानि कुएं से पानी खींचने के लिए बर्तन से बाँधी हुई रस्सी कुएं के किनारे पर रखे हुए पत्थर से बार-बार रगड़ खाती है तो पत्थर पर भी निशान बन जाते हैं। ठीक इसी प्रकार बार-बार अभ्यास करने से कोई भी कई नई बातें सीख कर उनका जानकार हो जाता है। हम यह कहावत आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि केरल में एक मां और बेटा, दोनों ने ही साथ पब्लिक सर्विस कमिशन की परीक्षा पास की है और अब सरकारी नौकरी करने जा रहे हैं।
जबसे बिंदू और उनके बेटे ने परीक्षा पास की है तबसे उनके घर पर मीडिया का जमावड़ा लगा हुआ है। बिंदू ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने 92वीं रैंक के साथ ‘लास्ट ग्रेड सर्वेंट’ (एलजीएस) परीक्षा पास की है। जबकि उनके 24 वर्षीय बेटे ने 38वीं रैंक के साथ अवर श्रेणी लिपिक (एलडीसी) की परीक्षा पास की है। बिंदू ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने शुरुआत अपने बेटे को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने के लिए की थी लेकिन इससे उन्हें खुद भी प्रेरणा मिली। उन्होंने बताया कि बाद में उन्होंने एक कोचिंग सेंटर में दाखिला लिया। जब उनके बेटे विवेक ने स्नातक परीक्षा पास कर ली तो उसी कोचिंग सेंटर में उसका भी दाखिला करा दिया।
बिंदू ने कहा कि यह सफलता आसानी से नहीं मिली है बल्कि उन्होंने एलजीएस के लिए दो बार और एलडीसी परीक्षा के लिए एक बार कोशिश की थी लेकिन उनका चौथा प्रयास सफल रहा। उन्होंने बताया कि उनका वास्तविक लक्ष्य आईसीडीएस पर्यवेक्षक परीक्षा थी, लेकिन अब जब एलजीएस परीक्षा पास कर ली है तो यह एक 'बोनस' लग रहा है है। बिंदू ने कहा कि इस सफलता के लिए मेहनत करने के वास्ते उसके कोचिंग सेंटर के शिक्षकों, दोस्तों और बेटे ने प्रोत्साहित किया और मार्गदर्शन भी किया।
वहीं बिंदू के बेटे विवेक ने साक्षात्कार के दौरान कहा कि हम दोनों एक साथ पढ़ाई नहीं करते थे, लेकिन विभिन्न विषयों पर अक्सर चर्चा जरूर करते थे। विवेक का कहना है कि मैं अकेले ही पढ़ाई करना पसंद करता हूं क्योंकि मां के पास समय नहीं रहता। विवेक ने बताया कि उसकी मां आंगनबाड़ी की ड्यूटी के बाद ही पढ़ाई करती हैं।
हम आपको बता दें कि केरल में स्ट्रीम-2 पदों के लिए आयु सीमा 40 है, लेकिन विशिष्ट श्रेणियों के लिए कुछ अपवाद हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग समूह में छूट तीन साल के लिए है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और विधवाओं के लिए यह छूट पांच साल के लिए है। बहरहाल, बिंदू और उनका बेटा विवेक तमाम लोगों के लिए प्रेरणा बन गये हैं कि अभावों के बावजूद यदि लगन हो तो जीवन में कुछ भी हासिल किया जा सकता है और लक्ष्य हासिल करने के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती।