पुण्यतिथि विशेष: संगीतकारों की पहली पसंद थे मन्ना डे

By रितिका कमठान | Oct 24, 2022

"तू प्यार का सागर है" गीत को आवाज देने वाले मन्ना डे के लिए ये गीत सबसे उपयुक्त है। ये ऐसा गीत है जिसमें प्यार के सागर से लोकप्रियता का अहम कभी नहीं झलकता दिखा। हालांकि समय बीतने के साथ ये गहराता गया है। मन्ना डे यानी प्रबोध चन्द्र डे आज हमारे बीच नहीं है मगर उन्होंने भारतीय सिनेमा जगत में कई शानदार फिल्मी गीतों को अपनी आवाज दी और

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इस फिल्म से शुरू हुआ फिल्मी सफर

फिल्म तमन्ना के साथ उन्होंने अपना फिल्मी सफर शुरू किया। इस फिल्म में एस. डी. बर्मन के साथ उनके गीत ऊपर गगन विशाल ने उन्हें लोकप्रियता दिलाई। मन्ना डे को पहली बार सिंगल गायक के तौर पर संगीतकार शंकर राव व्यास ने 'राम राज्य' (1943) फिल्म का गीत 'गई तू गई सीता सती' गाने का अवसर प्रदान किया था।

कई पुरस्कारों से हुए सम्मानित

मन्ना डे को उनके करियर के दौरान कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें भारत सरकार की ओर से वर्ष 1971 में पद्मश्री, 2005 में पद्मभूषण से सम्मानित किया और 2007 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

संगीतकारों की थे पहली पसंद

उनके करियर के दौरान एक समय ऐसा आया जब वो संगीतकारों के बीच बहुत प्रिय थे। वो इतने मशहूर थे कि उन्होंने एक समय एक वर्ष में 45 गीत तक गए थे। इस लोकप्रियता के पीछे कारण था कि अन्य गायकों की अपेक्षा उनकी गायन शैली काफी अलग थी। उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें बंगाली, गुजराती, मराठी, मलयालम, कन्नड़ और असमी भाषा में गाने का अवसर भी मिला। मन्ना डे ऐसे बेहतरीन और उम्दा गायक थे जो 50 और 60 के दशक में हर संगीतकार की पहली पसंद बन गए थे।

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बचपन में नहीं थी संगीतकार बनने की इच्छा

संगीत की दुनिया में कई इतिहास रचने वाले मन्ना डे बचपन में संगीत से जुड़ने के इच्छुक नहीं थी। गायक बनना तो दूर दूर उनके विचार में कहीं नहीं आया था। बड़े बड़े सितारों के गानों को अपनी आवाज देने वाले मन्ना डे ने इस बात का जिक्र अपनी पहले  आत्म कथा यादें जी उठी में किया था। उन्होंने जिक्र किया कि में गायक हूं, और मेरा पूरा जीवन संगीत को ही समर्पित रहा है। संगीत मेरे लिए ईश्वर है। संगीत मेरे लिए प्रेरणा और ज्ञान का स्त्रोत है। मैं संगीत के लिए जीता हूं। अपने बचपन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मैंने बचपन अपने बचपन का ज्यादातर समय दोस्तों के साथ लड़ने-झगड़ने में बिताया। वो ऐसा दौर था जब संगीत में ना कोई रुचि थी ना सीखने की इच्छा। मगर हमारे कुल के संगीतमय वातावरण के कारण मैं संगीत से जुड़ सका। इसके बाद मुझमें संगीत में निपुण होने की इच्छा जागी।

ऐसे मिली तालिम

एक बार संगीत के प्रति रुचि जागृत होने के बाद उन्होंने कभी वापस जाने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कृष्ण चंद्र डे और उस्ताद दाबिर खान से संगीत की तालीम ली, जिससे क्लासिकल में उनकी पकड़ मजबूत हुई। उन्होंने मुंबई आना तय किया और यहां एस डी बर्मन के अंडर असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। यहां उनके करियर को रफ्तार मिलने लगी। संगीत की तालीम लेने के कारण जल्द ही वो पसंद किया जाने लगे, इसके पीछे उनकी क्लासिकल नॉलेज और वॉइस रेंज भी मुख्य कारण रहा। बहुत लोगों को लगता है कि मन्ना डे ने सिर्फ क्लासिकल और सेमी क्लासिकल गाने गाए हैं। मगर उन्होंने कई फनी और कॉमिक गीतों को भी अपनी आवाज दी है।

मुश्किल गानों को गाने में थे माहिर

क्लासिकल संगीत सीखने की कारण उनकी पकड़ इसमें काफी मजबूत थी। उन्होंने कई क्लासिकल और सेमी क्लासिकल गाने गाए। संगीत में अच्छी शिक्षा होने के कारण कई मुश्किल गानों को भी वो सहजता से गाते थे। जानकारी का कहना है की जब मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार जैसे महान गायक किसी गाने को नहीं गा पाते थे तो वो गाना मन्ना डे को गाने के लिए दिया जाता था।

वर्ष 2013 में हमेशा के लिए सो गया ये सितारा

मन्ना डे ने बेंगलुरु में 24 अक्टूबर, 2013 को अंतिम सांस ली थी। इस समय उनकी उम्र 94 वर्ष थी।  बढ़ती उम्र के कारण वो कई बीमारियों से परेशान थे। उन्हें सांस लेने में परेशानी, गुर्दे की बीमारी भी थी। उन्हें बार बार डायलिसिस करवाना पड़ता था।

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