चुनौतियों से भरा रहा मामूली भूमिकाओं से लेकर सुर साम्राज्ञी तक का लता मंगेशकर जी का सफर

By रेनू तिवारी | Feb 06, 2022

मुंबई। जिस सम्मान के साथ महान गायिका लता मंगेशकर को आखिरी विदाई गयी ये सम्मान मांगा नहीं जाता कमाया जाता है। 92 साल की लता मंगेशकर ने अपनी जिंदगी के संघर्ष की शुरूआत 13 साल की उम्र में ही ककर दी थी। ये वो उम्र होती है जब बच्चा परिवार के साय में अपनी जिदंगी जीता है खेलता है कूदता है पढ़ाई करता है लेकिन यह सब लता मंगेशकर की जिंदगी में नहीं था। 13 साल की उम्र में ही उनके उपर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गयी थी। लता जी सभी भाई बहनों में सबसे बड़ी थी पिता की  मौत के बाद पूरे परिवार का भार उन्हीं के कंधों पर था। 

पिता का निधन हो चुका था और परिवार पालने का कोई जरिया ना था ... ऐसे में परिवार का बोझ उठाने के लिए लता मंगेशकर ने फिल्म उद्योग में छोटी छोटी भूमिकाओं से अपने कैरियर की शुरूआत की। उस समय किसे पता था कि एक वक्त आने वाला है, जब लता दशकों तक संगीत जगत पर राज करेंगी। मंगेशकर को उनके जन्म के समय ‘हेमा’ नाम दिया गया था, लेकिन उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर के नाटक ‘भाव बंधन’ में लतिका नाम की एक महिला चरित्र से प्रेरित होकर उन्हें लता नाम दिया गया।

पांच साल की उम्र में पिता के साथ गाया था गाना 

कम ही लोग जानते हैं कि पांच साल की उम्र में, गायिका ने मराठी में अपने पिता के संगीत नाटकों में एक अदाकारा के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। मंगेशकर पर लिखी किताब में लेखक यतींद्र मिश्रा ने नाट्यमंच पर गायिका की शुरुआत का जिक्र किया है। उन्होंने ‘लता: सुर गाथा’ में लिखा है, ‘‘पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर की नाटक कंपनी ‘बलवंत संगीत मंडली’ ने अर्जुन और सुभद्रा की कहानी पर आधारित नाटक ‘सुभद्रा’ का मंचन किया।

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 नौ साल की उम्र में लता जी ने नाटक में नारद का रोल किया था

पंडित दीनानाथ ने अर्जुन की भूमिका निभाई जबकि नौ वर्षीय लता ने नारद की भूमिका निभाई।’’ नाटक शुरू होने से पहले, लता ने अपने पिता से कहा कि वह हमेशा की तरह दर्शकों से वाहवाही और ‘वंस मोर’ की सराहना प्राप्त करेंगी। लता ने यह कर दिखाया। बाद में उन्होंने अपने पिता की फिल्म ‘गुरुकुल’ में कृष्ण की भूमिका निभाई। वर्ष 1942 में, जब लता मंगेशकर के पिता की हृदय रोग से मृत्यु हो गई, तब फिल्म अभिनेता-निर्देशक और मंगेशकर परिवार के करीबी दोस्त, मास्टर विनायक दामोदर कर्नाटकी ने उन्हें एक अभिनेत्री और गायिका के रूप में अपना करियर शुरू करने में मदद की।

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 मराठी सिनेमा से लेकर हॉलीवुड तक का सफर

मंगेशकर ने 1942 में वसंत जोगलेकर की मराठी फिल्म ‘किती हसाल’ के लिए सदाशिवराव नेवरेकर द्वारा रचित एक मराठी गीत ‘नाचू या गाड़े, खेलो सारी मणि हौस भारी’ गाया था, लेकिन दुर्भाग्य से गीत को हटा दिया गया था। मास्टर विनायक ने मंगेशकर को एक मराठी फिल्म ‘पहिली मंगला गौर’’ में एक छोटी भूमिका की पेशकश की थी और उनसे ‘नताली चैत्रची नवलई’ गीत भी गवाया था। 1945 में जब मंगेशकर मुंबई चली आईं , तो उन्होंने संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। मंगेशकर को 1945 में मास्टर विनायक की हिंदी की फिल्म ‘‘बड़ी मां’’ में अपनी छोटी बहन आशा भोसले के साथ एक छोटी भूमिका निभाने का अवसर मिला।

फिल्म में, उन्होंने एक भजन ‘माता तेरे चरणों में’ भी गाया था। अभिनय वक्त की जरूरत थी, उन्होंने मराठी फिल्मों में नायिका की बहन, नायक की बहन जैसी छोटी भूमिकाएं निभाईं, लेकिन उन्हें कभी भी मेकअप करना और कैमरे के सामने काम करना पसंद नहीं था। मंगेशकर ने 2008 में एनडीटीवी को बताया था, ‘‘मैंने एक अभिनेत्री के रूप में शुरुआत की थी। लेकिन मुझे एक्टिंग करना कभी पसंद नहीं था। मैं मास्टर विनायक के साथ काम करती थी। मैंने फिल्मों में काम किया लेकिन मुझे कभी मजा नहीं आया। मुझे मेकअप करने और कैमरे के सामने हंसने और रोने से नफरत थी। इसके बावजूद मैं गायन से प्यार करती थी। मैं बचपन से ही इसकी ओर आकर्षित थी।’’

फिर 1947 में मास्टर विनायक का निधन हो गया और उनकी ड्रामा कंपनी प्रफुल्ल पिक्चर्स बंद हो गई। मंगेशकर ने कहा था, ‘‘मैंने उसके बाद पार्श्व गायन शुरू किया।’’ संगीत निर्देशक गुलाम हैदर ने मंगेशकर को फिल्म मजबूर (1948) में पहला बड़ा ब्रेक गीतकार नाजिम पानीपति के गीत ‘‘दिल मेरा तोड़ा, मुझे कहीं का ना छोड़ा’’ गाने के साथ दिया जो उनकी पहली बड़ी सफलता वाली फिल्म थी। इसके बाद संगीत निर्देशक खेमचंद प्रकाश द्वारा रचित और अभिनेत्री मधुबाला पर फिल्माया गया फिल्म ‘महल’ (1949) का एक गीत ‘‘आयेगा आने वाला’’ गाया। इस गाने के बाद मंगेशकर को कभी पीछे पलटकर नहीं देखना पड़ा।

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