हिमालय क्षेत्र की बर्बादी से नेताओं को नहीं कोई सरोकार

By योगेंद्र योगी | Jan 31, 2026

देश के राजनीतिक दल देश के लोगों के लिए कितने गैरजिम्मेदार हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिमालय क्षेत्र में शोध पर आधारित दो महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जानकारी के बारे में किसी ने चिंता तक जाहिर नहीं की। इन रिपोर्टों में सर्दी के मौसम में हिमालय क्षेत्र जंगलों में लगने वाली आग के कारण और भूस्खलन के नए केंद्रों की जानकारी दी गई है। दरअसल ऐसी जानकारियों को गंभीरता से लेने पर राजनीतिक दलों के वोट बैंक में इजाफा नहीं होता। यही वजह है अत्यंत संवेदनशील और आम जन—जीवन को प्रभावित करने वाले पर्यावरण जेसे मुद्दे राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में जगह नहीं पाते हैं। 

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इसी तरह, कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक इलाकों में भी बर्फबारी लगभग न के बराबर हुई है। इस वजह से जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ी हैं। इस पूरे परिदृश्य को अब पर्यावरण प्रदूषण से जोड़कर देखा जा रहा है। देहरादून, ऋषिकेश और हल्द्वानी जैसे शहरों में एयर क्वालिटी इंडेक्स बार-बार बेहद खराब श्रेणी में पहुंच रहा है। देहरादून में तो कई बार यह इंडेक्स 300 के पार जा चुका है, जो सीधे तौर पर लोगों की सेहत के लिए खतरनाक माना जाता है। उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण बोर्ड की ओर से कराए गए एक अध्ययन ने चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्ट में सामने आया कि पर्यावरण प्रदूषण में फॉरेस्ट फायर की भूमिका 15 से 20 प्रतिशत तक है, जो कि बेहद गंभीर आंकड़ा है।

उत्तराखंड का हिमालयी भूगोल, जलवायु परिवर्तन और तेज विकास की दौड़ मिलकर राज्य के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में राज्य में तेज गति से सड़क निर्माण और बड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स हुए हैं। इसका परिणाम यह निकला कि चारधाम यात्रा रूट के आसपास लगभग 100 नए भूस्खलन क्षेत्र पैदा हो गए। पहले से मौजूद संवेदनशील जोन भी और अधिक खतरनाक हो गए हैं। चारधाम यात्रा और पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन तेजी से निर्माण कार्यों ने पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को कमजोर किया है। सड़क और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग की गई, भारी मशीनरी का उपयोग हुआ, जंगलों का व्यापक कटान किया गया। इन सभी वजहों से पुराने भूस्खलन क्षेत्र सक्रिय हुए और नए भूस्खलन क्षेत्र भी बन गए। उत्तराखंड के नेशनल हाईवे नेटवर्क पर करीब 400 भूस्खलन स्थल चिन्हित किए गए हैं।

उत्तराखंड में मानसून सीजन में हर साल प्राकृतिक आपदाओं से भारी नुकसान होता है। साल 2025 के मानसून सीजन में अब तक उत्तराखंड में रिकॉर्ड बारिश हुई है। उत्तराखंड में 2016 से 25 तक प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिसमें हजारों लोगों की जान गई है। पिछले 11 वर्षों में 27,197 प्राकृतिक घटनाएं हुई हैं, जिनमें अतिवृष्टि और भूस्खलन की घटनाएं प्रमुख हैं। साल 2025 में सबसे अधिक घटनाएं दर्ज हुईं, जिसमें 720 लोगों की मौत और 1207 लोग घायल हुए थे। इन 11 सालों के आंकड़े में केदारनाथ की साल 2013 में 16 और 17 जून को आई प्राकृतिक आपदा के आंकड़े नहीं जोड़े गए हैं। उस दौरान अकेले केदारनाथ में ही 4400 से ज्यादा लोग या तो लापता हो गए थे या फिर मारे गए थे।

हिंदुकुश हिमालय का इलाका भारत, चीन, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश तक फैला हुआ है। यहां गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी 11 बड़ी नदियां बहती हैं। वसंत के महीने में बर्फ पिघलने से ही इन नदियों को पानी मिलता है। लगभग 17 प्रतिशत आबादी पीने के पानी की जरूरतें पूरी करने के लिए सीधे तौर पर इससे जुड़ी हुई है। इसी पानी का उपयोग सिंचाई और हाइड्रोपावर के लिए भी किया जाता है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र के तापमान में वैश्विक औसत से 0.74°C अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही साल 2003 से 2020 तक हिमालय के अधिकांश हिस्सों में बर्फ से घिरे इलाकों में गिरावट देखी गई। पहले यहां औसतन 102 दिनों तक बर्फ रहती थी। अब हर दस साल में पांच दिन कम हो रहे हैं।

भारत के मौसम विभाग के मुताबिक पश्चिमी विक्षोभों के कमजोर होने से पिछले साल दिसंबर में उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में न के बराबर बर्फ गिरी। गढ़वाल में इस साल जनवरी में बर्फबारी का अभाव देखा गया। ऐसा पिछले 40 सालों में पहली बार हुआ है। कम हिमपात के चलते जटामांसी और कुटकी जैसी महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ीबूटियां विलुप्त हो रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों में स्नो ड्रॉट या ‘बर्फ का सूखा' जैसी स्थिति बन रही है। विशेष रूप से 3,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यह प्रभाव सबसे अधिक देखा गया है।

हिमाचल प्रदेश में बेलगाम विकास से पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट चिंता जता चुका है। कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो हिमाचल एक दिन नक्शे से गायब हो जाएगा। कोर्ट ने मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जवाबतलब किया। कोर्ट ने कहा कि हिमाचल में भूस्खलन, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएं मानव निर्मित हैं। बिना वैज्ञानिक अध्ययन के फोर लेन रोड बन रहे हैं और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लग रहे हैं। उनके लिए पेड़ काटे जा रहे हैं। पहाड़ों को बारूद से उड़ाया जा रहा है। सिर्फ राजस्व कमाना सब कुछ नहीं। पर्यावरण के विनाश की कीमत पर ऐसी कमाई हिमाचल के अस्तित्व को ही खत्म कर देगी। आश्चर्य की बात यह है कि राजनीतिक दलों को जो काम करना चाहिए उसे सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ रहा है। अभी भी वक्त है हिमालय क्षेत्र के पर्यावरण की यदि सुध नहीं ली गई कि तो भविष्य में ज्यादा गंभीर दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे।

- योगेन्द्र योगी

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