Ankita Bhandari Murder Case से BJP Leader Dushyant Kumar Gautam को जोड़ना Congress और AAP को पड़ा भारी

By नीरज कुमार दुबे | Jan 07, 2026

उत्तराखण्ड के अंकिता भंडारी हत्या प्रकरण को लेकर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही राजनीतिक अफवाहों और आरोपों पर आखिरकार न्यायिक हस्तक्षेप हुआ है। हाई कोर्ट ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को कड़ा संदेश देते हुए निर्देश दिया है कि वे भाजपा नेता दुष्यंत कुमार गौतम को इस जघन्य अपराध से जोड़ने वाली सभी पोस्ट तुरंत हटाएं। अदालत का साफ कहना है कि बिना किसी ठोस प्रमाण के किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाना न केवल अनैतिक है बल्कि कानूनन अपराध भी है।

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अदालत ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी की इज्जत उछालना स्वीकार्य नहीं हो सकता। कोर्ट ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ साथ एक महिला उर्मिला द्वारा पोस्ट किए गए सभी कथित मानहानिकारक कंटेंट को चौबीस घंटे के भीतर हटाने का आदेश दिया। यह भी कहा गया कि यदि भविष्य में ऐसी गतिविधि दोहराई गई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।

अदालत के आदेश के बाद भाजपा प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने इस फैसले को कानून की जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला उन सभी लोगों के मुंह पर तमाचा है जो सस्ती राजनीति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। उन्होंने कहा कि बिना तथ्य और आधार के पोस्ट डालना गंदी राजनीति का सबसे घटिया रूप है और अदालत ने इस पर स्पष्ट रेखा खींच दी है।

दूसरी ओर दुष्यंत कुमार गौतम ने भावुक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक पीड़ित परिवार के दर्द को राजनीतिक हथियार बनाकर तीन साल से अधिक समय तक उनका नाम घसीटा गया। उन्होंने याद दिलाया कि इतने समय में विपक्ष एक भी ऐसा दस्तावेज पेश नहीं कर सका जिससे उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि हो सके। दुष्यंत कुमार गौतम ने यह भी कहा कि पचास वर्षों के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उन्होंने हमेशा नैतिक मूल्यों और सार्वजनिक मर्यादा का पालन किया है। इसके बावजूद उन्हें और उनके परिवार को जिस मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा, वह शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। उन्होंने भरोसा जताया कि सच अंततः सामने आएगा और झूठ की राजनीति टिक नहीं पाएगी।

देखा जाये तो यह मामला केवल एक व्यक्ति की मानहानि का नहीं है, यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जो हर संवेदनशील घटना को सत्ता संघर्ष का अखाड़ा बना देती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अंकिता भंडारी की हत्या एक भयावह अपराध है, जिसने समाज को झकझोर दिया था। लेकिन इस अपराध पर न्याय की मांग करने की बजाय उसे राजनीतिक दलों ने अपने फायदे के लिए उछाल दिया। बिना प्रमाण किसी का नाम उछाल देना न तो पीड़िता को न्याय दिलाता है और न ही समाज को सच्चाई के करीब ले जाता है।

हाई कोर्ट का आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह याद दिलाया है कि लोकतंत्र में कानून सबसे ऊपर है, न कि ट्रेंडिंग हैशटैग। विपक्ष का यह तर्क कि सवाल पूछना उनका अधिकार है, तब तक ठीक है जब तक सवाल तथ्यों पर आधारित हों। लेकिन जब सवाल आरोप में बदल जाएं और आरोप प्रचार में, तब यह लोकतांत्रिक बहस नहीं बल्कि भीड़तंत्र बन जाता है। न्यायालय ने इसी भीड़तंत्र पर ब्रेक लगाया है। सबसे दुखद पहलू यह है कि इस पूरे शोर में असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। अंकिता को न्याय मिला या नहीं, दोषियों को सजा मिली या नहीं, इन सवालों से ज्यादा चर्चा इस बात पर होती रही कि किसे किससे जोड़ दिया जाए। यह राजनीति नहीं, संवेदनहीनता है।

आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। सत्ता मिले या न मिले, इंसाफ और सच्चाई से खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं है। अगर अदालतों को बार बार यह कहना पड़े कि बिना सबूत किसी पर आरोप न लगाएं, तो यह राजनीति के नैतिक दिवालियेपन का संकेत है। हाई कोर्ट का यह आदेश केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।

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