पत्रकारिता और साहित्य में आवश्यक है लोकमंगल - प्रो. सुरेन्द्र दुबे

By दिनेश शुक्ल | Jun 11, 2020

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित ‘कुलपति संवाद’ ऑनलाइन व्याख्यानमाला में प्रो. सुरेन्द्र दुबे ने कहा कि साहित्य के बिना पत्रकारिता की बात और पत्रकारिता के बिना साहित्य का जिक्र करना बेमानी सा लगता है। पत्रकारिता अपने उद्भव से ही लोकमंगल का भाव लेकर चली है। साहित्य का भी यही भाव हमेशा रहा है। इसीलिए यह दोनों हमेशा साथ-साथ चले हैं। ‘साहित्य और पत्रकारिता’ विषय पर अपने उद्बोधन में सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे ने कहा कि भारत में पत्रकारिता आधुनिकता के साथ आती है। यह आधुनिकता का विशेष उपहार है। पत्रकारिता के साथ ही भारत में पुनर्जागरण शुरू हुआ, इस पुनर्जागरण में कई साहित्यकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कुछ साहित्यकारों ने पत्रिकाओं का प्रकाशन कर राष्ट्रबोध कराने का प्रयास किया, तो कुछ साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश के लोगों को जगाने का प्रयास किया। इस दौर में पत्रकारिता और साहित्य का एक ही उद्देश्य था- पराधीनता से मुक्ति। 

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उन्होंने बताया कि साहित्य और पत्रकारिता का यह अभेद नाता महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा समझा जा सकता है। उनके विषय में यह तय करना कठिन है कि वे एक अच्छे साहित्यकार थे या अच्छे पत्रकार, दोनों ही विधाओं को उन्होंने साथ-साथ आगे बढ़ाया। साहित्य और पत्रकारिता का संबंध बताते हुए प्रो. दुबे ने बताया कि प्रायः सभी साहित्यकार कहीं ना कहीं पत्रकार ही होते हैं। वह अपनी रचनाओं को प्रकाशित कराते हैं, लोगों तक पहुंचाते हैं, साहित्य से समाज में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं। यही पत्रकारिता के भी कार्य हैं। अपने उद्बोधन में प्रो. दुबे ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता ने अपनी विकास यात्रा लगभग एक साथ ही तय की है। वीणा, सरस्वती, मतवाला आदि कई पत्रिकाओं ने कई बड़े साहित्यकारों को जन्म दिया है, तो वही कई साहित्यकारों ने सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया है। ऐसे में साहित्य और पत्रकारिता दोनों ही समाज को जागृत करने का प्रयास सदैव करते रहे हैं।

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