खामेनेई के भारत विरोधी बयानों पर नजर डालिये, क्या ऐसे व्यक्ति की मौत पर मातम मनाना जायज है?

By नीरज कुमार दुबे | Mar 06, 2026

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में हुई मौत के बाद भारत के कुछ हिस्सों में जिस तरह शोक और विरोध का माहौल बनाया जा रहा है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि भारत के आंतरिक मामलों में गैर-जरूरी टिप्पणियां करते रहे खामेनेई की मौत पर यहां हंगामा क्यों खड़ा किया जा रहा है? खासकर कश्मीर घाटी में हालात क्यों तनावपूर्ण बनाये जा रहे हैं? कश्मीर में जनजीवन लगातार छठे दिन प्रभावित है। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद यह पहली बार है जब घाटी में इतने बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिला है।

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यही नहीं, जनवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर ईरान की संसद के अध्यक्ष ने इसे मुस्लिम विरोधी बताया था, जिसे भारत ने अपने आंतरिक मामले में दखल करार दिया था। उसी साल दिल्ली दंगों के दौरान खामेनेई ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि भारत को चरमपंथी हिंदुओं का सामना करना चाहिए। उन्होंने दिल्ली दंगे के दौरान हिंसा को मुसलमानों का नरसंहार बताया था। उन्होंने यह तक कहा था कि भारत इस्लामी दुनिया से अलग थलग पड़ सकता है। यही नहीं, सितंबर 2024 में भी खामेनेई ने एक पोस्ट में भारत को म्यांमार और गाजा के साथ जोड़ते हुए टिप्पणी की थी, जिस पर भारत सरकार ने उसे गलत और अस्वीकार्य बताया था।

ऐसे व्यक्ति की मौत पर भारत में शोक मनाने वालों से सीधा सवाल है कि क्या उन्हें यह याद नहीं कि यही नेता भारत के खिलाफ लगातार बयान देता रहा था? खामेनेई की मौत पर भारत में मातम मना रहे लोगों को क्या ईरान में महिलाओं पर कठोर नियंत्रण और वहां के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कठोर दमनात्मक कार्रवाइयां भी दिखाई नहीं देतीं? 

यहां सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस संसदीय दल की चेयरपर्सन सोनिया गांधी आखिर किस नैतिक अधिकार से मोदी सरकार की ईरान नीति पर सवाल उठा रही हैं? सोनिया गांधी को याद होना चाहिए कि साल 2005 से 2009 के बीच जब भारत अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते पर बातचीत कर रहा था, तब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में तीन बार ईरान के खिलाफ मतदान किया था। आज जब वही दल केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठा रहा है, तब क्या उसे अपने पुराने फैसलों का जवाब नहीं देना चाहिए?

देखा जाये तो भारत की आधिकारिक नीति फिलहाल संतुलित दिखाई देती है। नई दिल्ली ने पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता की अपील दोहराई है और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है। लेकिन देश के भीतर जो भावनात्मक और राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आ रही है, उसने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर भारत में खामेनेई के लिए किस कारण से मातम मनाया जा रहा है? 

-नीरज कुमार दुबे

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