By प्रेस विज्ञप्ति | May 05, 2026
हाल ही में शाम सेवा फाउंडेशन के चेयरमैन और गुजरात के जाने-माने उद्योगपति मगनभाई पटेल ने अपने पोते शाम जतिनभाई पटेल का जन्मदिन हनुमान जयंती के दिन होने के कारण, 'ह्यूमैनिटी चैरिटेबल ट्रस्ट' (जिसके चेयरमैन श्री मगनभाई पटेल, अध्यक्ष डॉ. अंबरीश त्रिपाठी और सचिव भरतभाई पटेल हैं) के माध्यम से मनाया। इस अवसर पर लगभग 350 HIV ग्रस्त पुरुषों और महिलाओं को राशन किट, दवाइयां और आवश्यक वस्तुएं वितरित की गईं। इसके साथ ही, अहमदाबाद के बापूनगर स्थित भीड़ भंजन हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना की गई और वहां आयोजित भंडारे के लिए मंदिर के ट्रस्टियों को ₹1,11,111 की आर्थिक सहायता का चेक प्रदान कर समाज सेवा का उत्तम उदाहरण पेश किया। इस दिन मंदिर में 50,000 से अधिक भक्तों ने दर्शन किए और 15 से 20 हजार लोगों ने भोजन प्रसाद ग्रहण किया।
उन्होंने यह भी बताया कि अहमदाबाद के बापूनगर इलाके में स्थित भीड़ भंजन हनुमान मंदिर एक अत्यंत लोकप्रिय और श्रद्धा का केंद्र है। स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है। माना जाता है कि यह मंदिर करीब 200 वर्ष से भी अधिक पुराना है। 'भीड़ भंजन' नाम का अर्थ है 'कष्ट या कठिनाइयों को दूर करने वाला', इसीलिए भक्त अपनी समस्याओं के निवारण के लिए यहाँ दर्शन करने आते हैं।
मगनभाई पटेलने आगे बताया कि उनका पूरा परिवार वर्ष 1967 से व्यापार-उद्योग के साथ-साथ समाज सेवा से भी जुड़ा हुआ है। उनके पुत्र जतिनभाई मगनभाई पटेल, जो वर्ष 1994 से USA सिटिज़न होने के बावजूद अमेरिका का मोह छोड़कर उनके साथ रहते हैं और अहमदाबाद के वटवा में 'जतिन ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज' नामक कंपनी चलाते हैं। उनके पोते शाम जतिनभाई पटेल (उम्र 24 वर्ष) और पोती निधि जतिनभाई पटेल (उम्र 26 वर्ष) भी कई वर्षों से उनके साथ समाज सेवा के कार्यों में जुड़े हुए हैं। शाम जतिनभाई पटेलने गुजरात टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (GTU) से बी.ई. मैकेनिकल इंजीनियरिंग में प्रथम श्रेणी डिस्टिंक्शन के साथ प्राप्त की है और वर्तमान में अमेरिका की प्रथम श्रेणी की कॉलेज से फाइनेंस एवं मार्केटिंग मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री प्राप्त कर अहमदाबाद लौट आए हैं और अपने दादा मगनभाई पटेल के साथ उद्योग में जुड़ गए हैं। वहीं, निधि जतिनभाई पटेलने GTU से बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर में 69% अंक प्राप्त किए हैं। उनके पास काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर (भारत सरकार) और आर्किटेक्चर का अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस भी है। वर्तमान में वह अमेरिका के प्रथम श्रेणी के विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ आर्किटेक्ट की पढ़ाई कर रही हैं, जो अब पूरी होने वाली है। यह जानकारी देने का उद्देश्य केवल इतना है कि हमारे देश के युवा इससे प्रेरणा लेकर समाज के लिए उपयोगी बन सकें।
यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि हर महीने इन दोनों भाई-बहनों को दादा मगनभाई पटेल की ओर से पॉकेट मनी के रूप में दस-दस हजार रुपये दिए जाते थे, जिसकी वे बचत करते थे। वे अपना जन्मदिन सादगी से मनाकर उस बचत की राशि को सेवा कार्यों के लिए दान में देते रहते हैं। वर्ष 2014 से 2025 तक के पिछले 11 वर्षों में, इन दोनों भाई-बहन ने अपनी पॉकेट मनी की बचत से लगभग 15 लाख रुपये से अधिक का दान शैक्षणिक क्षेत्र, स्वास्थ्य क्षेत्र और शारीरिक-मानसिक रूप से विकलांग एवं दिव्यांग लोगों के लिए दिया है और आज भी दे रहे हैं। देश के युवाओं को एक प्रेरणा मिल सके, इसी उद्देश्य से इन दोनों भाई-बहनों के सेवा कार्य आपके समक्ष रख रहे हैं।
श्री मगनभाई पटेल HIV ग्रस्त महिलाओं के लिए कार्यरत संस्था "ह्यूमैनिटी चैरिटेबल ट्रस्ट" के चेयरमैन हैं। इस संस्था में लगभग 350 से अधिक HIV पॉजिटिव परिवार जुड़े हैं। इन परिवारों को मगनभाई पटेल द्वारा स्थायी रूप से हर महीने महंगी दवाइयाँ और इंजेक्शनों का पूरा खर्च हिसाब के अनुसार दिया जाता है। इसके अलावा, इन परिवारों के लिए राशन और बच्चों की शिक्षा का खर्च भी होता है, जिसमें श्री मगनभाई पटेल कई वर्षों से आर्थिक सहायता के रूप में बड़ी राशि दान कर रहे हैं।
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि इन 350 HIV ग्रस्त परिवारों में अधिकतर महिलाएँ हैं, जिन्हें हर महीने 40-50 के समूह में बुलाकर आवश्यक वस्तुओं का वितरण किया जाता है। हाल ही में, संस्था के प्रमुख डॉ.अंबरीशभाई त्रिपाठी के अहमदाबाद स्थित निवास स्थान पर राशन किट, पक्षियों के लिए पानी के कुंड, दाना और अन्य जीवन रक्षक वस्तुओं के वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
वहाँ मगनभाई पटेल ने निरीक्षण किया और देखा कि इस निवास स्थान में लगभग 300 गज की जगह खाली पड़ी थी। उन्होंने डॉ. त्रिपाठी को सुझाव दिया कि इस खाली जगह में नर्सरी, कक्षा-1 और कक्षा-2 के बच्चों के लिए बालमंदिर या प्लेग्रुप जैसे वर्ग शुरू किए जाएँ। साथ ही, उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त की कि वे इसके लिए आवश्यक चार कमरे बनवाकर देंगे, ताकि आसपास की बस्तियों (चालों) के छोटे बच्चे, जिनके पास स्कूल जाने के लिए वाहन की सुविधा नहीं है, उन्हें उचित शिक्षा मिल सके।
इस संस्था के अध्यक्ष डॉ. अंबरीशभाई त्रिपाठी और सचिव भरतभाई पटेल भी HIV ग्रस्त परिवारों के लिए दिन-रात कार्य करते रहते हैं। श्री मगनभाई पटेल के आर्थिक सहयोग से वे इन परिवारों की सभी जरूरतों को पूरा करते हैं। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि HIV ग्रस्त पुरुष या महिला शारीरिक श्रम करने में असमर्थ होते हैं, जिसके कारण वे नौकरी या व्यवसाय नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, उनके जीवन निर्वाह के लिए यह संस्था मगनभाई पटेल के नेतृत्व में आज कार्यरत है। समाज की अन्य संस्थाओं के लिए भी यह एक अनुकरणीय और ध्यान देने योग्य उदाहरण है।
हनुमान जयंती के दिन सुबह HIV ग्रस्त परिवारों को आवश्यक सहायता प्रदान करने के बाद, दोपहर में श्री मगनभाई पटेलने अपने पोते शाम जतिनभाई पटेल के साथ अहमदाबाद के बापूनगर इलाके में स्थित भीड़ भंजन मंदिर का दौरा किया।
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि श्री मगनभाई पटेल और उनकी पत्नी श्रीमती शांताबेन मगनभाई पटेल वर्ष 1966-67 से 1970 तक अहमदाबाद के बापूनगर-सरसपुर क्षेत्र में स्थित सौराष्ट्र पटेल सोसाइटी में रहते थे और वे वर्षों से इस मंदिर ट्रस्ट के साथ जुड़े हुए हैं। दो बेटियों के बाद, जब बेटा जतिनभाई शांताबेन के गर्भ में था, तब वे प्रतिदिन पटेल सोसाइटी से पैदल चलकर इस मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। इस मंदिर के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा थी, जिसका परिणाम शांताबेन का मानना हैं कि 15 अप्रैल 1969 को जतिनभाई मगनभाई पटेल का जन्म हुआ।
इस प्रकार, श्री मगनभाई पटेल का पूरा परिवार इस मंदिर के साथ बहुत गहरा संबंध रखता है, इसीलिए यह मंदिर अहमदाबाद में एक प्रमुख आस्था का केंद्र भी माना जाता है। मंदिर ट्रस्ट के महंत श्री धर्माचार्यजी अखिलेश्वरदासजी, ट्रस्टी श्री रणछोड़भाई देसाई, ट्रस्टी दिलीपभाई ब्रह्मभट्ट और ट्रस्टी श्री भगवानजीभाई वैश्नानी, श्री मगनभाई पटेल के साथ वर्ष 1966 से जुड़े हुए हैं।
श्री मगनभाई पटेलने इस अवसर पर भीड़ भंजन हनुमान मंदिर की सेवा गतिविधियों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह मंदिर ट्रस्ट अनेक सामाजिक कार्य करता है। यहाँ समय-समय पर आंगनवाड़ी के बच्चों के लिए मेडिकल कैंप आयोजित किए जाते हैं। इस क्षेत्र के स्कूलों में पढ़नेवाले आर्थिक रूप से जरूरतमंद बच्चों को शैक्षणिक सहायता प्रदान की जाती है और महिलाओं के लिए रोजगारपरक गतिविधियाँ भी संचालित की जाती हैं।
इस क्षेत्र में अक्सर नेत्र निदान शिविर, रक्तदान शिविर और जनरल मेडिकल कैंप जैसे चिकित्सा शिविर लगाए जाते हैं, जहाँ आनेवाले लोगों को निःशुल्क दवाइयाँ वितरित की जाती हैं। मंदिर की अपनी एक गौशाला भी है, जहाँ अनेक गायों की देखभाल की जाती है और उनका नियमित मेडिकल चेकअप भी होता है। इस प्रकार, यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि समाजोपयोगी कार्यों के माध्यम से स्थानीय लोगों की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करनेवाला एक समाज केन्द्र भी है।
श्री मगनभाई पटेलने इस अवसर पर हनुमान जी के प्राकट्य के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि पूरे भारत में अन्य देवी-देवताओं की तुलना में हनुमान जी के मंदिर सबसे अधिक माने जाते हैं। इनमें गुजरात के बोटाद जिले में स्थित प्रसिद्ध कष्टभंजन देव मंदिर के साथ-साथ राजस्थान का सालासर बालाजी, वाराणसी का संकट मोचन, शिमला का जाखू मंदिर, पटना का महावीर मंदिर और प्रयागराज के लेटे हुए हनुमानजी का मंदिर विश्व प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में से हैं। उल्लेख मिलता है कि केवल दक्षिण भारत में ही हनुमान जी के 712 मंदिर स्थापित किए गए हैं।
पौराणिक कथाओं और हिंदू धार्मिक ग्रंथों में किए गए उल्लेख अनुसार, हनुमानजी की माता अंजना पूर्व जन्म में 'पुंजिकस्थला' नाम की एक सुंदर अप्सरा थीं। एक बार पुंजिकस्थलाने पृथ्वी पर एक वानर मुखवाले ऋषि का मजाक उड़ाया। क्रोधित होकर ऋषिने श्राप दिया कि,"जब तुम किसी के प्रेम में पड़ोगी,तब तुम्हारा चेहरा वानर जैसा हो जाएगा।" जब पुंजिकस्थलाने क्षमा मांगी, तब ऋषिने कहा कि यह श्राप तभी दूर होगा जब वह भगवान शिव के अंश को जन्म देंगी।
श्राप के कारण अंजनाने वानर रूप धारण किया और उनका विवाह वानरराज केसरी से हुआ। माता के वानर स्वरूप में होने के कारण हनुमानजी का जन्म भी वानर (कपि) रूप में हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे पूरा "कपि" राज्य बना और इस स्वरूप की एक पूरी प्रजाति अस्तित्व में आई, जिसमें समयानुसार सुग्रीव, बाली, अंगद और हनुमानजी जैसे कपिराजों का साम्राज्य निर्मित हुआ।
वानर राज सुग्रीवने माता सीता की खोज के लिए अपनी पूरी वानर सेना को श्री राम के साथ लगा दि। हनुमानजी के त्याग, निष्ठा, सेवा और समर्पण जैसे गुणों से आज भी देश और दुनिया के लोग प्रेरणा लेते हैं। 'वानर' शब्द का एक अर्थ 'वन-नर' अर्थात जंगल में रहनेवाला मनुष्य भी होता है, परंतु पौराणिक कथाओं में उन्हें वानर मुख और लंबी पूंछवाले दैवीय पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है। कर्नाटक के हम्पी के पास स्थित अंजानाद्रि पर्वत को हनुमानजी का मूल जन्मस्थान माना जाता है।
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार एक मत यह भी है कि मनुष्य अवतार से पहले वानर रूप का अवतार था, जो अत्यंत बुद्धिमान और बहादुरी का प्रतीक था। इसीलिए हनुमानजी का वानर अवतार बल, बुद्धि, त्याग, समर्पण और सेवा का उत्तम उदाहरण है। इसका प्रमाण यह है कि जब सीताजी की खोज के बाद लंका जाने के लिए अथाह समुद्र पार करना था, तब हनुमानजी ने अपनी निस्वार्थ सेवा के बल पर पत्थरों पर “श्री राम” लिखकर समुद्र में डाला और अन्य वानर सेना इसमें जुड़ गई। इससे एक 'रामसेतु' का निर्माण हुआ, जिसके माध्यम से पूरी वानर सेना लंका पहुँच सकी।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब श्री राम ने अपना मनुष्य देह अवतार त्याग कर अपने धाम प्रस्थान किया, तब उन्होंने हनुमान जी को अमरत्व का वरदान देते हुए कहा था कि आप सृष्टि के अंत तक पृथ्वी पर वानर रूप में रहेंगे और जन कल्याण करते रहेंगे। इसी के परिणामस्वरूप आज हमारे देश में वानर की अनेक प्रजातियां देखने को मिलती हैं।
हमारे परिवारों में जब छोटे बच्चों को अंधेरे में जाने से डर लगता था, तब हमारी माँ हमसे कहती थी कि "हनुमानजी की हाकल पडे, भूत-पलीत के दांत पडे" (हनुमान जी की हुंकार से भूत-प्रेत भाग जाते हैं)। यह एक छोटी सी बात है, लेकिन इसमें निडरता और बहादुरी के गुण समाहित हैं। धार्मिक ग्रंथों में हनुमानजी को तेल चढ़ाने के पीछे का तर्क यह है कि एकबार हनुमानजी के पैर में किसी कारणवश चोट लग गई थी, तब उन्होंने तेल लगाकर पैर में जमे हुए रक्त और सूजन को दूर किया था। इसीलिए आज भी जब हमारे बच्चों को या किसी व्यक्ति को पैर में चोट लगती है या फ्रैक्चर होता है, तब उस पर तेल लगाकर पट्टी बांधी जाती है। पुराने समय में जब अस्पताल जैसी सुविधाएँ नहीं थीं, तब हड्डियों का उपचार करनेवाले 'हाड़-वैद्य' भी हनुमान जी को चढ़ाए गए तेल का उपयोग करते थे, क्योंकि इसमें पवित्रता की श्रद्धा जुड़ी थी और इससे व्यक्ति स्वस्थ भी हो जाता था।
हमारी हिंदू संस्कृति और धार्मिक केंद्रों में हनुमानजी जैसा त्याग, समर्पण और निष्ठावान पात्र का स्थान न किसी ने लिया है और न ही कोई ले पाएगा। आज भी हमारे देश में जहाँ-जहाँ राम मंदिर हैं, वहाँ हनुमान जी की मूर्ति भी अवश्य होती है और सर्वप्रथम उनकी पूजा की जाती है। वर्तमान में हमारे देश में राम मंदिरों की तुलना में हनुमान जी के मंदिरों की संख्या अधिक है। आज भी हनुमान मंदिरों और हमारे घरों में सुंदरकांड एवं हनुमान चालीसा जैसे पाठों का नित्य पठन किया जाता है, जिसका तात्पर्य केवल इतना है कि इससे व्यक्ति में आध्यात्मिक, सामाजिक और निर्डरता के गुणों का ज्ञान जागृत होता है। इसीलिए हनुमान जी की कथाओं में इन पाठों का महत्वपूर्ण स्थान है।
हाल ही में, 22 फरवरी 2026 को वलसाड जिले के धरमपुर तालुका के पीपरोड गाँव में 'श्री स्वामीनारायण ज्ञानपीठ-सलवाव,वापी' द्वारा 51 आदिवासी कन्याओं का 17वाँ सामूहिक विवाह समारोह श्री मगनभाई पटेल की अध्यक्षता में और उनके मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ। इस विवाह समारोह में वे मुख्यदाता के रूप में उपस्थित रहे। इसी दिन, इस 91वें हनुमान जी मंदिर का कलश पूजन भी मगनभाई पटेल और संत-महात्माओं के कर-कमलों द्वारा किया गया।
इस मंदिर की स्थापना इसलिए की गई ताकि इस क्षेत्र के आदिवासी लोगों की हनुमान जी के प्रति श्रद्धा बनी रहे और वे धर्म परिवर्तन से बच सके। साथ ही, इस मंदिर में सुबह-शाम होनेवाली हनुमान जी की पूजा-अर्चना से उनमें व्याप्त शराब, जुआ और लड़ाई-झगड़े जैसी असामाजिक प्रवृत्तियाँ दूर हुईं। आज भी हमारे देश के आदिवासी क्षेत्रों और आर्थिक रूप से पिछड़े इलाकों में हनुमानजी के मंदिरों की स्थापना की जाती है, ताकि वहाँ के लोग अंधविश्वास से दूर रहें और तांत्रिकों या ओझाओं के पास जाने के बजाय हनुमान जी की शरण में जाएँ। इससे वे अंधविश्वास के नाम पर होनेवाली बुराइयों एव दुष्कर्मों से स्वयं की और अपने परिवार की रक्षा कर सकें।