फिल्मों के लिए विख्यात महाराष्ट्र में आजकल ड्रामा देखने को मिल रहा है

By सुरेश हिन्दुस्थानी | Nov 20, 2019

महाराष्ट्र का राजनीतिक परिदृश्य दिन-प्रतिदिन परिवर्तित होता जा रहा है। चुनाव परिणाम के बाद जैसे-जैसे दिन व्यतीत हो रहे हैं, ठीक वैसे ही सरकार बनाने की प्रक्रिया उलझती जा रही है। राजनीतिक नफा नुकसान की बेहतर समझ रखने वाले राकांपा के शरद पवार शतरंज के माहिर खिलाड़ी की भांति ही अपनी राजनीति करते दिखाई दे रहे हैं। कोई माने या ना माने लेकिन यह महाराष्ट्र की राजनीति में सर्वथा स्वीकार करने वाली बात है कि पूरे प्रदेश में शरद पवार की हैसियत वाला दूसरा राजनेता वर्तमान में नहीं है। इसलिए स्वाभाविक रूप से यही कहा जाएगा कि शरद पवार पूरी तरह से ठोक बजाकर ही शिवसेना को समर्थन देंगे। हालांकि कुछ समय पूर्व इस प्रकार का दृश्य दिखाई दे रहा था कि शिवसेना अपना मुख्यमंत्री पूरे पांच साल के लिए बना लेगी, लेकिन अब ऐसा होना असंभव ही दिखाई दे रहा है। शिवसेना के पाले से मुख्यमंत्री की कुर्सी लगातार खिसकती ही जा रही है, जिससे उसका जल्दी मुख्यमंत्री बनाने का सपना भी धूमिल होता दिखाई देने लगा है। ऐसे में यह भी लग रहा है कि शिवसेना ने सरकार बनाने की जल्दी में अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम ही किया है। जो देर सवेर उसकी समझ में आएगा ही।

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कांग्रेस और राकांपा 'तेल देखो और तेल की धार देखो', वाली उक्ति को ही चरितार्थ कर रहे हैं। यह दोनों दल यह समझ चुके हैं कि शिवसेना येनकेन प्रकारेण अपना मुख्यमंत्री बनाने की ही राजनीति करने पर उतारू हो गई है। ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि राकांपा और कांग्रेस की ओर से एक बड़ी राजनीतिक चाल भी चली गई है, वह यही कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को कमजोर किया जाए। जिसके लिए उन्होंने शिवसेना को राजग से दूर होने की भी राजनीति की है। हालांकि केन्द्र की मोदी सरकार में शिवसेना के एक मात्र मंत्री के रूप में शामिल रहे अरविन्द सावंत से यह कहकर त्याग पत्र दिलवा दिया कि शिवसेना अब राजग का हिस्सा नहीं है, लेकिन राकांपा की ओर से कहा जा रहा है कि शिवसेना की ओर से इसकी अधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। ऐसा सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि अभी हाल ही में शिवसेना की ओर से ही ऐसा सवाल उठाया गया है कि शिवसेना को राजग से निकालने वाली भाजपा कौन होती है। इसका आशय यही निकाला जा रहा है कि शिवसेना खुद अभी अपने आपको राजग का हिस्सा ही मान रही है।

वर्तमान में महाराष्ट्र की राजनीति में जिस प्रकार की ऊहापोह की स्थिति बनी है, उसको देखकर यही लग रहा है कि कांग्रेस और राकांपा दोनों ही दल शिवसेना के विचार से भिन्न विचार रखते हैं, इसलिए शिवसेना पर एकाएक विश्वास करना टेढ़ी खीर ही साबित हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ यह भी दिखाई दे रहा है कि शिवसेना के विधायक भी इन दोनों दलों पर पूरा भरोसा करने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। भाजपा से अलग होकर शिवसेना को जो सावधानी बरतनी चाहिए थी, वह उसकी तरफ से नहीं बरती जा रही है। कमोवेश ऐसा ही लग रहा है कि शिवसेना के सभी विधायक अपने नेतृत्व के निर्णय के साथ नहीं हैं। शिवसेना के कई विधायक अपनी हिन्दुत्व की छवि को अलग करना नहीं चाहते। इसलिए अब शिवसेना के समक्ष लगभग ऐसी स्थिति निर्मित होती जा रही है जिसमें एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई है।

राकांपा और कांग्रेस की तरफ से समर्थन की स्थिति साफ नहीं होने के बाद अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि हो सकता है महाराष्ट्र में फिर से पांच साल पहले की स्थिति ही निर्मित हो जाए। ऐसा इसलिए भी कहा जाने लगा है कि शिवसेना के अधिकांश विधायक भाजपा के साथ ही सरकार बनाने की मानसिकता रखते हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से शिवसेना के लिए यही ठीक माना जा रहा है। वहीं राजग के एक घटक दल के नेता रामदास आठवले ने यह कहकर इस बात को हवा दी है कि भाजपा तीन वर्ष और शिवसेना दो वर्ष अपना मुख्यमंत्री बनाए, लेकिन इस प्रस्ताव पर भाजपा और शिवसेना दोनों दल किस प्रकार तैयार होते हैं, यह पता नहीं है। लेकिन यह संभव लग रहा है।

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महाराष्ट्र में सबसे बड़ा पेंच राकांपा के शरद पवार के बयानों के कारण भी निर्मित हुआ है। उन्होंने अभी हाल ही में कहा है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं बन पाने की स्थिति में ही देर हो रही है। दूसरी तरफ शिवसेना संबंधी सवाल पर वे यह भी कह रहे हैं कि शिवसेना के बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम। इसलिए यही कहा जा रहा है कि अभी मामला पूरी तरह से खटाई में ही है। अभी सरकार बनने की किसी भी प्रकार की कोई स्थिति दिखाई नहीं दे रही है। यह सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है कि शिवसेना की ओर से स्पष्ट रूप से कहा जा रहा है कि दिसम्बर तक सरकार बन जाएगी। इसका मतलब यही है कि तीनों दलों में बहुत बड़ा राजनीतिक पेच फंसा हुआ है। इसका हल कैसे निकलता है, अब यही देखना बाकी है।

-सुरेश हिन्दुस्थानी

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