''ना माया मिली ना राम'' कहावत शिवसेना पर एकदम फिट बैठती है

''ना माया मिली ना राम'' कहावत शिवसेना पर एकदम फिट बैठती है

बीजेपी के रवैये से पहले से ही खार खाकर बैठी शिवसेना ने विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के साथ ही 50-50 के फार्मूले के तहत शिवसेना के मुख्यमंत्री का राग अलापना शुरू कर दिया और इसी के साथ शुरू हो गया महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा नाटक।

शिवसेना एक ऐसा राजनीतिक दल है जिसे आज भी बाला साहेब ठाकरे के नाम से ज्यादा जाना जाता है और इसके बाद ही उद्धव ठाकरे या ठाकरे परिवार के किसी अन्य व्यक्ति का नाम लिया जाता है। हालांकि हाल के दिनों में शिवसेना की तरफ से एक ही व्यक्ति के नाम की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है जो अखबारों के पन्नों से लेकर टीवी के स्क्रीन तक पर छाया हुआ है और लगातार एक ही बात घुमा-फिराकर बार-बार कह रहा है कि इस बार महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। लेकिन इन तमाम दावों के बीच हकीकत यही है कि हर गुजरता दिन शिवसेना के लिए भारी होता जा रहा है।

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शिवसेना का हाल– न माया मिली न राम

राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर मोदी-शाह की जोड़ी उदय होने के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी ने भी छोटे भाई की भूमिका को नकार कर अपने लिए बड़े भाई का ओहदा तय कर लिया था। 2019 में जो अलगाव नजर आ रहा है उसकी शुरूआत सही मायनों में 2014 में ही हो गई थी जब बीजेपी ने अकेले राज्य में विधानसभा का चुनाव लड़ा था और चुनाव बाद शरद पवार की पार्टी से अप्रत्यक्ष सहयोग लेकर राज्य में सरकार बनाई थी। उस समय देवेंद्र फड़नवीस राज्य के मुख्यमंत्री बने और आखिरकार शिवसेना को भी मजबूर होकर बीजेपी के साथ ही जाना पड़ा लेकिन उसके बाद भी राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक शिवसेना और उसका मुखपत्र सामना हमेशा विरोधी राग ही गाता नजर आया। 2019 में दोनों दलों ने मिलकर पहले लोकसभा और फिर विधानसभा का चुनाव साथ लड़ा। लेकिन बीजेपी के रवैये से पहले से ही खार खाकर बैठी शिवसेना ने विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के साथ ही 50-50 के फार्मूले के तहत शिवसेना के मुख्यमंत्री का राग अलापना शुरू कर दिया और इसी के साथ शुरू हो गया महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा नाटक।

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शरद पवार का पॉवर पॉलिटिक्स

शरद पवार को महाराष्ट्र की राजनीति का चाणक्य माना जाता है। उन्हें राज्य में नए राजनीतिक समीकरण को बनाने और बिगाड़ने का सबसे बड़ा खिलाड़ी माना जाता है। ऐसे में जब यह खबर सामने आई कि शिवसेना किसी भी हालत में बीजेपी को मुख्यमंत्री पद देने को तैयार नहीं है तो इसे पवार की पॉवर पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा उदाहरण माना गया। यह माना गया कि पवार के कहने पर ही शिवसेना ने बीजेपी के साथ तलाक जैसा बड़ा फैसला लेने में देर नहीं की। लोगों ने यह भी मान लिया कि शिवसेना शरद पवार की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से आराम से राज्य में सरकार बना सकती है लेकिन यह इतना आसान भी कहां था। पहले यह माना जा रहा था कि शिवसेना की सरकार बन सकती है, कांग्रेस और एनसीपी बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए शिवसेना का मुख्यमंत्री तक कबूल कर सकती है लेकिन हर गुजरते दिन के साथ यह लग रह रहा है कि शिवसेना की हालत न माया मिली न राम जैसी होती जा रही है। हर कीमत पर अपना मुख्यमंत्री बनाने को बेचैन शिवसेना सोनिया-पवार की हर बात बिना शर्त मानती नजर आई। बीजेपी से नाता तोड़ा, एनडीए का साथ छोड़ा। मोदी सरकार से अपने मंत्री को इस्तीफा दिलवाया, यहां तक कि हिंदुत्व से जुड़े कोर एजेंडे तक को छोड़ने को तैयार हो गई लेकिन इसके बावजूद 10 जनपथ के दरबार से चिठ्ठी अभी तक नहीं आई।

शिवसेना के मुख्यमंत्री में आखिर कहां फंसा है पेंच

वास्तव में जितना आसान यह माना जा रहा था, उतना आसान यह पूरा मामला है भी नहीं। शरद पवार भले ही महाराष्ट्र की राजनीतिक जरूरतों को देखते हुए शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाने को तैयार हो गए हों लेकिन राजनीति की चतुर खिलाड़ी सोनिया गांधी को इसका अहसास है कि इसका प्रभाव सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि देश के हर राज्य में पड़ेगा। उस केरल में पड़ेगा जहां से राहुल गांधी सांसद हैं। उस बिहार और पश्चिम बंगाल में पड़ेगा जहां विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पड़ेगा जहां कांग्रेस को अपनी खोई जमीन को तलाशना है। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में पड़ेगा जहां अल्पसंख्यक वोटों के बल पर ही कांग्रेस की जमीन बची हुई है। ऐसे में कांग्रेस सिर्फ एक राज्य में बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए देश के तमाम राज्यों में अल्पसंख्यक वोटों में किसी भी तरह का बिखराव भला क्यों झेलना चाहेगी। यही वजह है कि किंतु-परंतु में फंसी हुई कांग्रेस बैठकों के लगातार दौर के बावजूद अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। यही वजह है कि सोनिया गांधी की तरफ से लगातार नई-नई शर्तें सामने आ रही हैं और हर नई शर्त पहले के मुकाबले ज्यादा कठोर है। सोनिया गांधी चाहती हैं कि शरद पवार शिवसेना के स्टैंड की गारंटी लें। यह गारंटी लें कि नागरिकता कानून, समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण कानून जैसे हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों पर शिवसेना मोदी सरकार के साथ खड़ी नजर न आए। लेकिन क्या वाकई ऐसा हो सकता है ? भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में किसी भी राजनीतिक दल के व्यवहार की गारंटी उसका नेता तक नहीं ले सकता तो भला दूसरी पार्टी का अध्यक्ष कैसे ले सकता है ? रही-सही कसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शरद पवार की पार्टी की तारीफ करके पूरा कर देते हैं जो शिवसेना और कांग्रेस दोनों के दिलों की धड़कनों को बढ़ा देता है।

-संतोष पाठक






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