आम आदमी पार्टी पर बड़ा संकट- केजरीवाल कब छोड़ेंगे पार्टी सुप्रीमो की कुर्सी?

By संतोष कुमार पाठक | Apr 25, 2026

आम आदमी पार्टी के सुप्रीम लीडर अरविंद केजरीवाल अपने सांसदों द्वारा 24 अप्रैल को उन्हें दिए गए गिफ्ट को कभी भूल नहीं पाएंगे। सरकार से लड़-भिड़कर केजरीवाल ने अदालत के जरिए जो सरकारी बंगला लिया था, उस बंगले में परिवार सहित शिफ्ट होने की जानकारी केजरीवाल ने जिस दिन सोशल मीडिया पर शेयर किया, उसी दिन उनके भरोसेमंद सांसदों ने उनकी पार्टी ही तोड़ दी।

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राघव चड्ढा की जिस काबलियत को देखकर एक जमाने में कुमार विश्वास, संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल ने उन्हें इंटर्न के तौर पर पार्टी के साथ जोड़ा था। उसी काबलियत का इस्तेमाल करते हुए बड़ी ही चालाकी से राघव चड्ढा ने आप के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का जुगाड़ ( खुद को मिलाकर) करते ही बीजेपी का दामन थाम लिया।टूट के लिए कानूनी रूप से जरूरी दो-तिहाई सांसदों का जुगाड़ कर एक बार फिर से राघव चड्ढा ने अपनी काबलियत तो साबित कर दी लेकिन इस बार वे अपने ही राजनीतिक गुरु केजरीवाल पर भारी पड़ गए।

पार्टी छोड़ने से पहले उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, जिस पार्टी को खून-पसीने से सींचा वह अपने सिद्धांतों से भटक गई है। वहीं केजरीवाल ने अपने राजनीतिक स्टाइल के मुताबिक, बीजेपी पर पंजाबियों के साथ धोखा देने का आरोप लगाया। आम आदमी पार्टी और उनके पूरे सिस्टम ने इन्हें गद्दार, यहां तक कि देशद्रोही तक साबित करने का अभियान छेड़ दिया है। 

जबकि होना तो यह चाहिए था कि इतनी बड़ी टूट के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं, खासकर आंदोलन के समय के नेताओं को बैठकर आत्ममंथन करना चाहिए। वर्ष 2013 से पहले और उसके बाद आए तमाम नेताओं पर नजर डालते हुए, यह सोचना चाहिए कि अब तक कितने गए, कब गए, क्यों गए और किसकी वजह से गए? लेकिन इसकी बजाय केजरीवाल पार्टी छोड़कर जाने वाले हर नेता को गद्दार साबित करने में जुट जाते हैं ताकि पार्टी के अंदर कोई भी उनके रवैए पर सवाल न उठा पाए।

आप का जन्म भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए देशव्यापी आंदोलन से हुआ था इसलिए इस पार्टी का खत्म होना दशकों तक इस देश को आंदोलन के नाम से डराता रहेगा। इसके लिए सिर्फ ऑपरेशन लोटस और बीजेपी को जिम्मेदार बता देने से काम नहीं चलेगा। 

संजय सिंह और मनीष सिसोदिया जैसे नेताओं को तुरंत पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आपात बैठक बुलाकर कुछ कड़े फैसले लेने की पहल करनी चाहिए। दिल्ली में मिली हार के बाद अब यह सवाल तो बेमानी हो गया है कि 'एक व्यक्ति, एक पद' के नियम के बावजूद अरविंद केजरीवाल वर्षों तक दो-दो पदों पर कैसे बने रहे? लेकिन अब यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर पिछले साढ़े 13 वर्षों से एक ही व्यक्ति ( अरविंद केजरीवाल ) पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक क्यों बने हुए हैं? क्या संजय सिंह, मनीष सिसोदिया या पार्टी के किसी भी अन्य नेता में पार्टी की कमान संभालने की क्षमता नहीं है ? नेताओं को पार्टी से निकालने का मामला हो या राज्यसभा उम्मीदवार तय करने का मामला हो, यह सब कुछ एक ही व्यक्ति की इच्छा पर कब तक छोड़ा जाएगा? आखिर पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी क्यों बनाई गई है और इसका काम क्या है? पहले दिल्ली में सत्ता सुख भोगों और जब यहां पर जनता सत्ता से बाहर कर दें तो पंजाब जाकर जम जाओ, ये किस तरह का रवैया है? चाहे वो केजरीवाल हो या मनीष सिसोदिया या फिर बिभव  कुमार या फिर कोई अन्य नेता या कर्मचारी, दिल्ली की हार के बाद क्या ये लोग 3-4 साल भी दिल्ली में या देश के अन्य राज्यों में संघर्ष नहीं कर सकते जो ये लोग सत्ता वाले राज्य पंजाब को घर बनाने निकल पड़ते है? अगर इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे गए तो यकीन मानिए कि आने वाले दिनों में आप का पूरा संगठन भी बीजेपी में विलय होता हुआ नज़र आएगा।

अगर यह सब सिर्फ एक या दो व्यक्ति की जिद के कारण हो रहा है तो पार्टी के सभी नेताओं को मिलकर उन्हें किनारे लगाकर किसी और सक्षम नेता को जिम्मेदारी देनी चाहिए। पार्टी को अपने पुराने नेताओं की भी घर वापसी का अभियान बड़े पैमाने पर चलाना चाहिए और सबसे बड़ी बात आप के नेताओं को यह समझना चाहिए कि राज्यसभा की सांसदी का टिकट धन्नासेठों के लिए नहीं पार्टी के समर्पित कार्यकताओं के लिए होता है।

राजनीतिक हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं, अगर उससे भी ज्यादा तेजी से आप ने बदलाव नहीं किए तो आने वाले दिनों में पार्टी के नाम और निशान दोनों पर ही बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि क्या अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, बिभव कुमार, भगवंत मान और आतिशी इस बड़े बदलाव के लिए तैयार हैं? 

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

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