सांसद और विधायक भाग रहे, क्या ममता बनर्जी भी TMC छोड़ कर कांग्रेस में जा रही हैं?

By नीरज कुमार दुबे | Jun 11, 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे उथल पुथल भरे दौर से गुजर रही है। कभी बंगाल की निर्विवाद ताकत मानी जाने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अब अंदरूनी बगावत, सांसदों और विधायकों के पलायन तथा राजनीतिक अस्तित्व के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। दिल्ली में सोनिया गांधी के साथ ममता बनर्जी और राहुल गांधी के साथ अभिषेक बनर्जी की बैठकों ने इस संकट को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया है। भले ही कांग्रेस और तृणमूल दोनों सार्वजनिक रूप से किसी विलय की संभावना से इंकार कर रहे हों, लेकिन घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि बंगाल की राजनीति में एक बड़ा पुनर्संयोजन शुरू हो चुका है। एक तरह से यह साफ नजर आ रहा है कि सिर्फ टीएमसी के सांसद, विधायक और पार्षद ही पाला नहीं बदल रहे हैं खुद टीएमसी प्रमुख अपनी पार्टी को खत्म कर कांग्रेस में वापस लौटना चाह रही हैं।

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स्थिति यह है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर विद्रोह अब खुली चुनौती का रूप ले चुका है। पार्टी के 80 में से 58 विधायक अलग होकर निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ चले गए हैं। इस गुट को विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है। रितब्रत बनर्जी लगातार दावा कर रहे हैं कि वही “असली तृणमूल कांग्रेस” हैं और कांग्रेस के साथ किसी भी प्रकार के विलय या समझौते के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि उनके साथ विधायकों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई सांसद भी उनके संपर्क में हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के साथ संभावित विलय या अत्यधिक नजदीकी की अटकलों ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर असुरक्षा और बेचैनी को और बढ़ा दिया है। पार्टी के कई विधायक, सांसद और क्षेत्रीय नेता अपनी पूरी राजनीतिक पहचान कांग्रेस विरोध की जमीन पर बनाकर आगे बढ़े थे। ऐसे में उन्हें यह डर सता रहा है कि यदि ममता बनर्जी अंततः कांग्रेस के साथ विलय या व्यापक राजनीतिक समझौते की राह पर चलती हैं, तो उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान समाप्त हो जाएगी। यही कारण है कि तृणमूल में भगदड़ और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कांग्रेस में लौटने के पक्ष में नहीं है और वह या तो अलग गुट के साथ रहना चाहता है या फिर नए राजनीतिक विकल्प तलाश रहा है। यही बेचैनी अब खुले विद्रोह और लगातार इस्तीफों के रूप में सामने आती दिखाई दे रही है।

संकट केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। संसद में भी तृणमूल कांग्रेस की नींव हिलती दिख रही है। राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। उनसे पहले सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर राय भी पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा दे चुके हैं। सुष्मिता देव की असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा से मुलाकात ने यह अटकलें और तेज कर दी हैं कि तृणमूल कांग्रेस के कई नेता अब भारतीय जनता पार्टी की ओर रुख कर सकते हैं।

लोकसभा में भी तृणमूल के भीतर विद्रोही खेमे की ताकत बढ़ती दिखाई दे रही है। काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व वाला गुट दावा कर रहा है कि उसे बीस से अधिक सांसदों का समर्थन हासिल है। सयोनी घोष, माला राय, युसुफ पठान, शताब्दी राय, शत्रुघ्न सिन्हा और रचना बनर्जी जैसे कई चर्चित नाम विद्रोही खेमे के साथ बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह गुट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को समर्थन देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिख चुका है।

इन घटनाओं के बीच कांग्रेस की भूमिका बेहद दिलचस्प हो गई है। बंगाल कांग्रेस के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। अधीर रंजन चौधरी और अब्दुल मन्नान जैसे वरिष्ठ नेता ममता बनर्जी के साथ किसी भी तरह की नजदीकी के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। मन्नान ने तो यहां तक कह दिया कि “गंदे पानी को साफ पानी में मिलाने से साफ पानी भी गंदा हो जाता है।” अधीर रंजन चौधरी ने ममता पर कांग्रेस को बंगाल से खत्म करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अब वही ममता गांधी परिवार के सहारे की तलाश में हैं।

दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि जो राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री और विपक्ष का नेता मानता है, उसका स्वागत है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने के लिए कांग्रेस की छतरी का इस्तेमाल करने वालों के लिए दरवाजे खुले नहीं हैं। यह बयान सीधे तौर पर तृणमूल के उन नेताओं की ओर इशारा माना जा रहा है जिन पर विभिन्न घोटालों के आरोप लगे हैं।

हम आपको याद दिला दें कि ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक उदय ही कांग्रेस के खिलाफ विद्रोह की जमीन पर खड़ा हुआ था। वर्ष 1998 में उन्होंने जोरशोर से कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उस समय ममता ने कांग्रेस नेतृत्व पर बंगाल की राजनीति की अनदेखी करने और वामपंथ के सामने आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाया था। इसके बाद उन्होंने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थापित किया और धीरे धीरे बंगाल में कांग्रेस की जड़ें कमजोर कर दीं। वर्ष 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक विस्तार के लिए कांग्रेस से पूरी दूरी बना ली थी और लगातार गांधी परिवार तथा कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे हमले करती रहीं। लेकिन अब जब तृणमूल कांग्रेस भीतर से टूट रही है, सांसद और विधायक पार्टी छोड़ रहे हैं और राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई दे रही है, तब वही ममता बनर्जी एक बार फिर कांग्रेस की जड़ों की ओर लौटती नजर आ रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में गांधी परिवार के साथ उनकी बैठकों को केवल शिष्टाचार मुलाकात मानने को राजनीतिक विश्लेषक तैयार नहीं हैं।

दरअसल, बंगाल की राजनीति अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह अस्तित्व की जंग बन चुकी है। तृणमूल कांग्रेस संगठनात्मक बिखराव से जूझ रही है और बात सिर्फ संसद या विधानसभा में उसके सदस्यों तक सीमित नहीं रह गयी है। बंगाल में कई निगमों से उसके महापौर या पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं और पंचायतों में भी इसी तरह के इस्तीफों का दौर जारी है। इस सबके बीच भाजपा यह स्पष्ट कर चुकी है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के लिए उसके दरवाजे बंद हैं वहीं कांग्रेस इस संकट को अपने पुनर्जीवन के अवसर के रूप में देख रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता की राजनीति को मजबूती देने के लिए कांग्रेस बंगाल में नई संभावनाएं तलाश रही है।

बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ राजनीतिक समझौते की राह पर चलेंगी, या फिर पार्टी के भीतर का विद्रोह उन्हें और कमजोर कर देगा। यदि तृणमूल कांग्रेस का टूटना जारी रहा तो बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। आने वाले नगर निकाय चुनाव और उपचुनाव इस बदलाव की पहली बड़ी परीक्षा साबित होंगे। फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में शुरू हुई यह हलचल केवल राज्य तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है।

-नीरज कुमार दुबे

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