Nushrratt Bharuccha ने किये महाकाल के दर्शन तो भड़क गये Maulana Shahabuddin Razvi, जारी कर दिया फतवा

By नीरज कुमार दुबे | Jan 01, 2026

उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में बॉलीवुड अभिनेत्री नुसरत भरूचा की आध्यात्मिक यात्रा ने अचानक एक सियासी-धार्मिक बहस का रूप ले लिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार को नुसरत भरूचा ने महाकाल मंदिर में भस्म आरती में भाग लिया, भगवान महाकाल के दर्शन किए और गर्भगृह में चादर भेंट कर आशीर्वाद लिया। यह उनका दूसरा दौरा था, जिसे उन्होंने सुंदर अनुभव बताया। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो और तस्वीरों में वह श्रद्धा में लीन दिखाई दीं। उन्होंने तिलक लगाया, जलाभिषेक किया और आरती में शामिल हुईं।


नुसरत ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि मंदिर प्रबंधन द्वारा श्रद्धालुओं के लिए की गई व्यवस्थाएँ उन्हें बेहद पसंद आईं और वह हर साल महाकाल के दर्शन के लिए आने की योजना बना रही हैं। नए साल से पहले महाकाल के दरबार में उमड़े श्रद्धालुओं के बीच खुद को पाकर उन्होंने “जय महाकाल” लिखते हुए इंस्टाग्राम स्टोरी भी साझा की। लेकिन इस आस्था-पूर्ण क्षण पर विवाद की छाया तब पड़ी, जब ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने नुसरत की मंदिर यात्रा और हिंदू अनुष्ठानों में भागीदारी पर आपत्ति जताते हुए फतवा जारी कर दिया। फतवे में कहा गया कि एक मुस्लिम महिला द्वारा मूर्ति-पूजा और दूसरे धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेना शरीयत के खिलाफ है और यह “गुनाह-ए-अज़ीम” की श्रेणी में आता है।

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मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने कहा कि तिलक लगाना, भस्म आरती में भाग लेना और जल चढ़ाना इस्लामी सिद्धांतों की सीमा को पार करता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई का अधिकार नहीं है; वह केवल धार्मिक मार्गदर्शन दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि नुसरत को “तौबा” करनी चाहिए और “कलमा” पढ़कर अपने गुनाह का प्रायश्चित करना चाहिए। इस बीच, इस फतवे ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। कई लोगों ने इसे व्यक्तिगत आस्था में दखल बताया, तो कई ने इसे कट्टरता की मिसाल कहा। रज़वी ने आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नफरत भरे संदेश उन्हें विचलित नहीं करते और उन्होंने हमेशा बांग्लादेश, कश्मीर और पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रही हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई है। उन्होंने कहा कि नुसरत “अच्छी मुस्लिम” हैं तो वह उनकी सलाह मानेंगी, अन्यथा फतवे को नज़रअंदाज़ कर सकती हैं।


देखा जाये तो यह विवाद केवल एक अभिनेत्री की मंदिर-यात्रा का नहीं है; यह उस मानसिकता का आईना है, जो आज भी व्यक्ति की आस्था पर पहरा बैठाना चाहती है। सवाल यह नहीं है कि कौन किस धर्म का है, सवाल यह है कि क्या किसी इंसान की निजी आध्यात्मिक अनुभूति पर कोई स्वयंभू ठेकेदार मुहर लगाएगा या उसे “गुनाह” का तमगा पहनाएगा? भारत का संविधान नागरिक को धर्म मानने, न मानने और अपने तरीके से आध्यात्मिक अनुभव लेने की आज़ादी देता है। नुसरत भरूचा ने न तो किसी धर्म का अपमान किया, न किसी के विश्वास पर चोट की। उन्होंने केवल एक मंदिर में जाकर श्रद्धा व्यक्त की। लेकिन जैसे ही आस्था की यह अभिव्यक्ति किसी तयशुदा खांचे से बाहर निकलती है, वैसे ही फतवों की तलवारें चमकने लगती हैं।


फतवे का सबसे खतरनाक पहलू उसकी कानूनी हैसियत नहीं, बल्कि उसका मनोवैज्ञानिक दबाव है। यह संदेश दिया जाता है कि अगर तुम हमारी व्याख्या से अलग चले, तो तुम “अच्छे” नहीं रहोगे। यही सोच समाज को जोड़ने की बजाय तोड़ती है। विडंबना यह है कि जिन मंचों से बार-बार सहअस्तित्व और भाईचारे की बात की जाती है, वहीं से ऐसी घोषणाएँ निकलती हैं जो दीवारें और ऊँची कर देती हैं। धार्मिक नेता का काम डर पैदा करना नहीं, बल्कि इंसानियत का रास्ता दिखाना होना चाहिए। अगर हर आस्था-अनुभव को धर्मग्रंथ की कठोर पंक्तियों में कैद कर दिया गया, तो फिर आत्मिक स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाएगा?


नुसरत भरूचा का “जय महाकाल” कहना किसी के ईमान पर हमला नहीं है। यह उस भारत की आवाज़ है, जहाँ लोग डर से नहीं, श्रद्धा से पूजा करते हैं। सवाल यह है कि क्या हम उस भारत को चुनेंगे, या उस संकीर्ण सोच को, जो हर कदम पर प्रमाण-पत्र मांगती है?

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