मायावती आखिर राजनीति में अब इतना असुरक्षित क्यों महसूस कर रही हैं ?

By रमेश सर्राफ धमोरा | Jan 22, 2020

बसपा सुप्रीमो मायावती इन दिनों कांग्रेस पार्टी पर आग बबूला हो रही हैं। इसी कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा पिछले सप्ताह दिल्ली में केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए बुलाई गई बैठक में भाग नहीं लिया था। मायावती का कहना था कि कांग्रेस पार्टी एक तरफ तो विपक्षी दलों को एक साथ कर उनका नेतृत्व करना चाहती है। वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की रणनीति पर काम करती रहती है। इसी कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बैठक का बहिष्कार किया था।

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मायावती ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को भी अपने निशाने पर ले रखा है। उन्होंने राजस्थान में कोटा के एक सरकारी अस्पताल में एक माह में 110 नवजात शिशुओं की मौत पर भी सवाल उठाते हुए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में तो प्रियंका गांधी छोटी-छोटी बातों पर धरना देने पर उतारू हो जाती हैं। जबकि राजस्थान में उनकी पार्टी की सरकार में इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी वह जयपुर जाकर लौट आयीं। उन्होंने कोटा जाकर पीड़ित परिवारों से मिलना मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने प्रियंका गांधी की ऐसी दोहरी नीति की भी आलोचना की।

बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती इन दिनों अपना राजनीतिक जनाधार बचाने को संघर्ष कर रही हैं। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक तरह से उनकी पार्टी का पूरी तरह सफाया हो गया था। तब बसपा को मात्र 19 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती को ऐसी स्थिति का सामना तो बसपा के प्रारंभिक काल में भी नहीं करना पड़ा था। अपने खिसकते जनाधार को बचाने के लिए ही 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती को अपनी चिर प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ना पड़ा था। उस चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में 10 सीटें जीतने में सफल रही थी। जबकि समाजवादी पार्टी को मात्र 5 सीटें ही मिली थीं।

लोकसभा चुनाव के कुछ समय बाद ही मायावती ने समाजवादी पार्टी से अपने सभी तरह के गठबंधन को समाप्त करते हुए अकेले चलने की रणनीति अपनाई थी। लेकिन उसके बाद उत्तर प्रदेश में जितने भी उपचुनाव हुए उसमें बसपा अपनी प्रभावी भूमिका निभाने में सफल नहीं हो पाई। इससे चिंतित मायावती को लगता है कि यदि उसने कांग्रेस के साथ उसके पिछलग्गू की छवि से पीछा नहीं छुड़वाया तो आने वाले समय में उसका रहा सहा जनाधार भी जाता रहेगा। कांग्रेस के दलित वोटों के बल पर ही देश भर में बसपा का अपना वोट बैंक तैयार हुआ था। जो कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से धीरे-धीरे फिर से कांग्रेस की तरफ खिसकने लगा है। जिससे बसपा का जनाधार भी कम होता जा रहा है।

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपने जीवन में ही बसपा की कमान पूरी तरह से मायावती के हाथों सौंप कर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। कांशीराम के जमाने में बसपा का देश के कई राज्यों में प्रभाव था जो अब सिमट कर उत्तर प्रदेश तक ही रह गया है। बसपा ने 1989 से लेकर 2019 तक के लोकसभा चुनाव में देश भर में कुल 86 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की है। जिनमें पंजाब की पांच, मध्य प्रदेश की चार, हरियाणा की एक व उत्तर प्रदेश की 77 सीटें शामिल हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 21 सीटों पर जीत हासिल हुई थी तथा उसे पूरे देश में 6.17 प्रतिशत वोट मिले थे, जो बसपा का अब तक का सर्वोच्च प्रदर्शन था। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 10 सीटों पर विजय हासिल कर देश में 3.63 प्रतिशत मत प्राप्त किये जो 1996 के बाद से अब तक का सबसे हल्का प्रदर्शन था।

मायावती के नेतृत्व में बसपा उत्तर प्रदेश में अब तक चार बार सरकार बना चुकी है तथा 1993 से 2017 तक वहां कुल 537 विधानसभा सीटें भी जीत चुकी हैं। इसके अलावा 1990 से 2018 तक बसपा के मध्य प्रदेश में 30 विधायक जीत चुके हैं। वहीं राजस्थान में बसपा के 19, छत्तीसगढ़ में 7, बिहार में 13, दिल्ली में 3, हरियाणा में 4, हिमाचल प्रदेश में 01, जम्मू एवं कश्मीर में 5, झारखंड में 01, कर्नाटक में 01, पंजाब में 10, तेलंगाना में 02 व उत्तराखंड में 18 विधायक जीतने में सफल रहे हैं।

देश के कई प्रदेशों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने वाली बसपा का जनाधार धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का खाता भी नहीं खुल पाया था जबकि उस चुनाव में बसपा ने पूरे देश में 530 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे जिन्हें पूरे देश में 4.3 प्रतिशत मत मिले थे। 2014 का लोकसभा चुनाव व 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा के लचर प्रदर्शन से डर कर ही पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपनी सबसे बड़ी दुश्मन समाजवादी पार्टी से भी हाथ मिलाने से भी गुरेज नहीं किया था, जिसका मायावती को लोकसभा चुनाव में बड़ा लाभ भी मिला।

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मई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से मायावती अब तक चार बार लोकसभा में अपनी पार्टी का नेता बदल चुकी हैं। उन्होंने सबसे पहले अमरोहा से सांसद व पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के करीबी कुंवर दानिश अली को लोकसभा में पार्टी का नेता मनोनीत किया था। लेकिन संसद में धारा 370 पर पार्टी लाईन से हटकर राय रखने के कारण उनको हटाकर जौनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव को नेता बना दिया था। मगर यादव का झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ देखकर फिर से कुंवर दानिश अली को नेता बनाया था। लेकिन चौथी बार फिर से फेरबदल करते हुये मायावती ने अम्बेडकरनगर के सांसद रितेश पांडे को लोकसभा में नेता मनोनीत किया है।

लोकसभा में बार-बार बसपा का नेता को बदलना मायावती में व्याप्त असुरक्षा की भावना को ही दर्शाता है। बसपा में कांशीराम के जमाने के अधिकांश पुराने नेताओं को या तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया या फिर उन्हें अपनी अलग राह चुनने पर मजबूर किया गया था। जिस कारण आज बसपा में बहुत कम पुराने नेता रह गये हैं। बसपा में अब अन्य दलों से आने वाले नेताओं को तरहीज दी जाने लगी है। जिस कारण बसपा का मूल काडर स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। यह बसपा के लिये शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है।

-रमेश सर्राफ धमोरा

(स्वतंत्र पत्रकार)

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