अब पिता की तरह तुष्टिकरण की राजनीति करेंगे अखिलेश यादव !

अब पिता की तरह तुष्टिकरण की राजनीति करेंगे अखिलेश यादव !

अखिलेश यादव मुसलमानों के पक्ष में खड़ा होने का अब कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। चाहे आजम खान के समर्थन की बात हो या फिर एनआरसी अथवा नागरिकता संशोधन बिल, वह हमेशा मुसलमानों के साथ खड़े नजर आए। इसी क्रम में 19 को समाजवादी पार्टी प्रदर्शन करने जा रही है।

तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके मुलायम सिंह यादव अगर चाहते तो एक बार और सीएम बन सकते थे, लेकिन 2012 में चौथी बार जब उनके मुख्यमंत्री बनने का मौका आया तो उन्होंने स्वयं के बजाए पुत्र अखिलेश यादव की सीएम पद पर ताजपोशी करा दी थी। मुलायम ने स्वास्थ्य कारणों से या फिर पुत्र मोह में यह फैसला लिया था, इसका कभी खुलासा नहीं हो पाया, लेकिन नेताजी का यह फैसला काफी लोगों को रास नहीं आया था, जिसमें समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं के अलावा उनके परिवार के सदस्य भी शामिल थे। मुलायम सिंह अपने आप को समाजवादी नेता और चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया का चेला बताते हैं। वैसे मुलायम के सियासी गुरुओं में लोहिया के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, चन्द्रशेखर, राज नारायण जैसे तमाम नाम शामिल थे, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि मुलायम कभी भी उक्त 'गुरुओं' के बताए रास्ते पर चलते नहीं दिखाई दिए। मुलायम ने सियासत में संघर्ष तो खूब किया, लेकिन सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के लिए उन्होंने सर्वसमाज की आवाज बनने के बजाए शॉर्टकट का रास्ता अपनाया। इसके लिए मुलायम ने वोट बैंक की सियासत की। मुलायम की सारी सियासत मुसलमानों और पिछड़ों (पिछड़ों में खास करके यादव) पर केन्द्रित रही। मुलायम ने मुस्लिम वोट बैंक को अपने (समाजवादी पार्टी) साथ ऐसे जोड़कर रखा, जैसे 'फैविकोल' का जोड़ हो। अयोध्या विवाद के दौरान मुलायम लगातार हिन्दुओं की भावनाओं की चिंता किए बगैर मुसलमानों के पक्ष की बात करते रहे। कारसेवकों पर गोलियां चलाने से भी उन्हें गुरेज नहीं हुआ। मुलायम की तुष्टिकरण की सियासत के एक नहीं दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं। पिछड़ी बिरादरी से सियासत की दुनिया में कदम रखने वाले मुलायम ने अपने ऊपर लगे पिछड़ी जाति के धब्बे को ऐसा धोया कि लोग पिछड़ी जाति का होने का दर्द भूलकर इसके सहारे नई ऊंचाइयां छूने लगे।

बहरहाल, बात मुलायम से आगे बढ़कर अखिलेश की सियासत की कि जाए तो अखिलेश विकास और युवाओं के रोजगार की बात करते थे, जिस कम्प्यूटर का मुलायम विरोध किया करते थे, अखिलेश सरकार बनी तो उन्होंने मेधावी छात्रों को फ्री में कम्प्यूटर बांट कर छात्रों का उत्साहवर्धन किया। अखिलेश ने जाति धर्म की सियासत से दूरी बनाकर रखी तो सपा के आजम खान, शिवपाल सिंह यादव जैसे नेता उनसे नाराज हो गए, लेकिन अखिलेश ने अपनी सियासी चाल नहीं बदली। अखिलेश को मुख्यमंत्री बने दो वर्ष भी नहीं हुए थे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ गया। सपा पांच सीटों पर सिमट कर रह गई। इसके बाद समाजवादी पार्टी में ऐसा संग्राम छिड़ा कि बाप−चचा और बेटा आपस में ही उलझ पड़े। 2017 तो समाजवादी पार्टी के लिए उससे भी बुरा गुजरा, समाजवादी पार्टी के हाथ से सत्ता खिसक कर बीजेपी के हाथों में पहुंच गई। इस दौरान अखिलेश ने कई सियासी प्रयोग भी किए, लेकिन सब जगह उन्हें मुंह की खानी पड़ी। मुस्लिम वोटर भी तितर−बितर होने लगा था, कुछ बसपा में चले गए तो कुछ कांग्रेस में, परंतु हाल ही में हुए उप−चुनाव में समाजवादी पार्टी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि सभी 12 विधान सभा सीटों पर हुए उप−चुनाव में सपा का ने केवल वोट बैंक बढ़ा, बल्कि मुस्लिम वोटरों ने एक मुश्त सपा के पक्ष में वोटिंग की थीं। इसी के बाद अखिलेश यादव का मुस्लिम प्रेम गहराने लगा है। वह मुसलमानों के पक्ष में खड़ा होने का अब कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। चाहे आजम खान के समर्थन की बात हो या फिर एनआरसी अथवा नागरिकता संशोधन बिल, वह हमेशा मुसलमानों के साथ खड़े नजर आए। इसी क्रम में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ 19 दिसम्बर को समाजवादी पार्टी प्रदर्शन करने जा रही है।

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समाजवादी पार्टी ने संशोधित नागरिकता कानून, किसानों की बदहाली सहित अन्य कई मुद्दों को लेकर 19 दिसंबर को प्रदेश के सभी मंडलायुक्त कार्यालयों पर धरना−प्रदर्शन का ऐलान किया है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी जिला इकाइयों को भी इस धरना−प्रदर्शन में पूरी ताकत से जुटने का निर्देश दिया है। अखिलेश ने कहा कि गन्ना, धान, आलू आदि के किसान घोर संकट में हैं। सरकार किसानों की समस्याओं पर विचार करने को ही तैयार नहीं है। गन्ना का मूल्य नहीं बढ़ाया गया। प्रशासन की मिली भगत से गन्ना माफिया खरीद केंद्रों पर किसानों से जबरदस्ती उतराई शुल्क वसूल कर रहे हैं। किसानों का पिछले वर्षों का लगभग 5000 करोड़ रुपया गन्ना मूल्य अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। नोटबंदी और जीएसटी से व्यापार चौपट हो गया है। कई व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद हो गए हैं। हजारों नौजवान बेरोजगार हो गए हैं। सपा अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ने नागरिकता विधेयक लाकर देश और समाज को बांटने की साजिश की है। इस कानून से समाज के बड़े वर्ग में तनाव और आक्रोश व्याप्त हो गया है। यह केंद्र सरकार की बहकाने की राजनीति का हिस्सा है ताकि जनता का ध्यान मूल मुद्दों और आर्थिक मंदी से हटाया जा सके। सपा प्रमुख ने कहा कि धरना देकर सपा मांग करेगी कि बंद चीनी मिलों को तत्काल चालू कराया जाए। धान क्रय केंद्रों को बिचौलियों से मुक्त किया जाए। अखिलेश ने कहा कि धान खरीद केंद्रों पर बोरे तक उपलब्ध नहीं हैं। पुवाल, पराली जलाने के नाम पर किसानों पर फर्जी मुकदमा दर्ज किए जा रहे हैं। इन मुकदमों को वापस लिया जाए। आलू उत्पादकों को आलू की लागत के अनुसार समर्थन मूल्य दिया जाए।

खैर, अखिलेश के सामने जब मौका मोदी−योगी सरकार पर हमले और उसे घेरने का आता है तब तो वह काफी तत्परता दिखाते हैं, लेकिन संगठन को मजबूती करने के मोर्च पर वह पिछड़ जाते हैं। समाजवादी पार्टी में संगठन के पुनर्गठन की प्रक्रिया काफी धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही है। इससे जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी व फ्रंटल संगठनों में ओहदों के दावेदारों में बेचैनी है। वे लगातार जोड़तोड़ में लगे हैं। सबसे ज्यादा मारामारी जिलाध्यक्षों को लेकर है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 24 अगस्त को प्रदेश अध्यक्ष को छोड़कर राज्य इकाई, जिला इकाइयां व नीचे फ्रंटल संगठन भंग कर दिए थे। अब तक इनका पुनर्गठन नहीं हो पाया है। 28 नवंबर को 15 जिलाध्यक्षों की घोषणा की गई थी। इसके बाद पदाधिकारी नामित किए गए हैं। अन्य जिलाध्यक्षों का ऐलान अभी तक नहीं हो पाया है। पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी व बुंदेलखंड तक तमाम जिलों में जिलाध्यक्ष पद के लिए दावदारों में होड़ लगी हुई है। प्रदेश इकाई में जगह बनाने के लिए भी लखनऊ से दिल्ली तक दौड़−धूप चल रही है। यही हाल फ्रंटल संगठनों का है। समाजवादी युवजन सभा, छात्र सभा, मुलायम सिंह यादव यूथ ब्रिगेड और लोहिया वाहिनी का जिलों से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्षों की घोषणा के बाद इनकी कमेटियां बनेंगी। जिला अध्यक्ष को विधानसभा क्षेत्रों, ब्लॉकों व बूथों तक संगठन का विस्तार करना है। अध्यक्ष नामित होने के बाद ही यह प्रक्रिया शुरू होगी। सपा नेताओं का कहना है कि अध्यक्षों व अन्य पदाधिकारियों की घोषणा नहीं होने से जिलास्तरीय कार्यक्रम प्रभावित हो रहे हैं। देखाना यह है कि इसका सपा के 19 तारीख के प्रदर्शन पर क्या प्रभाव पड़ता है। वैसे सपा के रणनीतिकारों को तो यही लगता है कि जो नेता संगठन में पद चाहते हैं, वह सपा के कार्यक्रम को सफल बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे ताकि उनकी दावेदारी मजबूत हो सके।

उधर, अखिलेश से अलग उनके छोटे भाई की बहू अपर्णा यादव को आश्चर्य है कि समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन बिल (कैब) का क्यों विरोध कर रही है। अपर्णा ने एनआरसी और कैब बिल का समर्थन किया है। टि्वटर पर अपर्णा ने लिखा है, जो भारत का है उसे रजिस्टर में अंकित होने में क्या समस्या है ? अपर्णा यादव ने इस मुद्दे पर अपनी अलग राय जाहिर की है। वैसे बताते चलें कि अपर्णा यादव अक्सर सपा की लाइन से हटकर बयान देती रहती हैं। अभी हाल में सपा ने लखनऊ कैंट विधानसभा उपचुनाव में अपर्णा यादव को टिकट न देकर मेजर आशीष चतुर्वेदी को उम्मीदवार घोषित किया था। इस कारण भी अपर्णा यादव को खासा नाराज बताया गया था।

-अजय कुमार