By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 02, 2026
श्रीनगर, दो नवंबर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सोमवार को केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच ‘अविश्वास’ के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि इस क्षेत्र की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कश्मीर के मुद्दे पर अक्सर अपना रुख बदलती रही है। कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए महबूबा ने कहा, “इस संदेह के माहौल के लिए कौन जिम्मेदार है? 79 साल पहले भारत आजाद हुआ था और 79 साल पहले ही जम्मू-कश्मीर भारत में शामिल हुआ था।
22 साल तक आपने पाकिस्तान में जनमत संग्रह कराने की मांग की और फिर अचानक (1975 में) दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी स्वीकार कर ली।” उन्होंने इंदिरा-शेख समझौते का जिक्र करते हुए यह बात कही, जिसके तहत नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक को मुख्यमंत्री बनाया गया था जबकि उनकी पार्टी का एक भी विधायक नहीं था। महबूबा ने दावा किया कि शेख अब्दुल्ला सत्ता की चाहत के कारण मुख्यमंत्री बनने के लिए सहमत हो गए थे। उन्होंने कहा, “जब आप प्रधानमंत्री की जगह मुख्यमंत्री बने तो आपने लोगों से जनमत संग्रह को भूल जाने को कहा क्योंकि आपको सत्ता की जरूरत थी।
भारत के नेताओं ने, चाहे वह जवाहरलाल नेहरू हों या डॉ. बी.आर. आंबेडकर, हमें विशेष दर्जा और संविधान दिया था, लेकिन उनके मन में न केवल नेताओं को लेकर, बल्कि हर एक कश्मीरी को लेकर संदेह पैदा कर दिया गया था।” महबूबा ने जोर देकर कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर के हितों को नुकसान पहुंचाया है और कहा कि जब तक यह पार्टी सत्ता में रहेगी, तब तक शांति कायम नहीं हो पाएगी। पीडीपी अध्यक्ष ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उनसे कहा कि वे 2014 में सरकार बनाने के लिए भाजपा के साथ किए गए गठबंधन को लेकर शर्मिंदा न हों। उन्होंने आगे कहा, “जब वे (नेकां) आपको भाजपा के साथ गठबंधन के बारे में बताएं, तो उन्हें याद दिलाएं कि उनके ही नेता ने कश्मीर पर अपने बदलते रुख से लोगों को मुसीबत में डाला था।” नेकां अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का नाम लिए बिना, महबूबा ने दावा किया कि तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके फारूक अब्दुल्ला यह कहकर कश्मीरियों को उकसा रहे हैं कि पाकिस्तान कश्मीर की रक्षा कर रहा है।
उन्होंने दावा किया, “यह उनका (फारूक अब्दुल्ला का) एक संकेत है (दिल्ली के लिए) कि कश्मीरी पाकिस्तान के साथ हैं।” केंद्र की ओर ध्यान केंद्रित करते हुए, महबूबा ने तर्क दिया कि कश्मीर मुद्दे को जबरदस्ती के उपायों से नहीं, बल्कि बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है।