Mehbooba Mufti ने दिखाया अपना असली रंग, आतंकवादियों के परिजनों की आवाज उठाते हुए खेला Victim Card

By नीरज कुमार दुबे | Nov 12, 2025

लाल क़िले के पास हुए धमाके के बाद जम्मू-कश्मीर में जोरदार तरीके से छापेमारी चल रही है। पुलिस द्वारा चार जिलों— कुलगाम, शोपियां, अवंतीपोरा और गांदरबल में चलाया गया व्यापक तलाशी अभियान यह स्पष्ट संकेत देता है कि अब सरकार सिस्टमेटिक सफाई के मोड में है। जमात-ए-इस्लामी जैसे प्रतिबंधित संगठनों और उनके सपोर्ट नेटवर्क को जड़ से उखाड़ने की कोशिश हो रही है, ताकि कश्मीर में आतंक का सामाजिक व वैचारिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त किया जा सके। इस बार की कार्रवाई का दायरा अभूतपूर्व है— कुलगाम में 200 से अधिक स्थानों पर छापे, चार दिनों में 400 से अधिक कॉर्डन-एंड-सर्च ऑपरेशन और डेढ़ हज़ार से अधिक लोगों से पूछताछ। यह संख्या महज आँकड़े नहीं हैं; यह एक नए सुरक्षा यथार्थ का संकेत है जिसमें राज्य अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाने को तैयार है।

इन अभियानों की पृष्ठभूमि में दो बड़े कारक हैं। दिल्ली के लाल क़िले के पास हुआ विस्फोट और हरियाणा-उत्तर प्रदेश में पकड़ा गया आतंकी मॉड्यूल, जिसके तार कश्मीर से जुड़े पाए गए। यह स्पष्ट है कि आतंकी तंत्र अब केवल घाटी तक सीमित नहीं, बल्कि अंतर-राज्यीय नेटवर्क के रूप में पुनर्गठित होने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यह कार्रवाई न केवल आवश्यक है, बल्कि राष्ट्र सुरक्षा की अनिवार्यता है।

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हालाँकि, हर बार की तरह, कुछ राजनीतिक स्वर इस निर्णायक कार्रवाई को लेकर संदेह पैदा करने में लगे हैं। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती का बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि “परिजनों को बिना अपराध के गिरफ्तार न किया जाए”, एक बार फिर उनकी राजनीतिक दुविधा और वैचारिक भ्रम को उजागर करता है। महबूबा मुफ़्ती और उनके जैसे नेताओं को यह समझना होगा कि भारत अब उस दौर में नहीं है जब आतंकवाद को ‘भावनात्मक या स्थानीय समस्या’ के रूप में देखा जा सके। यह अब राष्ट्रीय सुरक्षा की लड़ाई है और इसमें ढिलाई का कोई स्थान नहीं। जब पुलिस “सपोर्ट नेटवर्क” पर प्रहार कर रही है, तो यह केवल बंदूक चलाने वाले आतंकियों को नहीं, बल्कि उनके वैचारिक और आर्थिक संरक्षकों को निशाना बना रही है।

देखा जाये तो महबूबा मुफ़्ती का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यह आतंकवाद के खिलाफ़ चल रहे समन्वित प्रयासों को कमजोर करता है। उनकी राजनीति हमेशा विक्टिम कार्ड खेलने की रही है— कभी अनुच्छेद 370 के नाम पर, कभी ‘कश्मीर की आवाज़ दबाने’ के नाम पर। लेकिन हकीकत यह है कि इन अभियानों का उद्देश्य कश्मीर की आवाज़ को दबाना नहीं, बल्कि आम कश्मीरियों को आतंक की गुलामी से मुक्त कराना है।

साथ ही जमात-ए-इस्लामी, हिज्बुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद या अंसार गजवातुल हिंद, ये सब संगठन केवल धार्मिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि हिंसक नेटवर्क हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य भारत की अखंडता को तोड़ना है। इनसे जुड़े “शैक्षणिक संस्थान” और “सामाजिक संगठन” लंबे समय से कट्टरपंथी विचारधारा के प्रसारक बने हुए हैं। ऐसे में पुलिस की यह कार्रवाई केवल दमन नहीं, बल्कि डि-रेडिकलाइज़ेशन का राष्ट्रीय अभियान है।

दूसरी ओर, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक इस बात का संकेत है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन अब किसी भी स्तर पर लापरवाही या राजनीतिक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा। पुलिस, सीआईडी और केंद्रीय एजेंसियों का समन्वय इस बार बेहद प्रभावी है और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी आतंकी पुनर्गठन की कोशिश सफल न हो सके।

बहरहाल, आज की स्थिति में भारत के पास दो ही रास्ते हैं— या तो महबूबा मुफ़्ती जैसी ‘भावनात्मक राजनीति’ के भ्रमजाल में फंसे रहना, या फिर एक निर्णायक और एकीकृत भारत की दिशा में बढ़ना। केंद्र सरकार और सुरक्षा बलों ने अपना रास्ता चुन लिया है और यह वही रास्ता है जो कश्मीर को स्थायी शांति, सुरक्षा और विकास की ओर ले जाएगा।

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