यमुनाजी में प्रवासी पक्षी (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 15, 2026

सर्दी के मौसम में विदेशी पक्षी दूर दूर से, हमारी झीलों और नदियों में कुछ समय के लिए रहने, प्रेम करने और प्रजनन जैसे महत्त्वपूर्ण काम के लिए आते हैं। इस बहाने वे विदेश भ्रमण का मज़ा भी लेते हैं। शायद हमारे देश के पक्षी भी विदेश जाते होंगे। उन्हें वहां का साफ़ सुथरा स्वच्छ पर्यावरण बहुत पसंद आता होगा। इधर हमारे जागरूक मीडिया की खबरें बताती हैं कि पिछले दिनों, कुछ विदेशी पक्षियों ने यमुनाजी में प्रवास करने से इनकार कर दिया। हमारे पारदर्शी ईमानदार, संजीदा गणना  करने वाले ऐसा कह रहे हैं। उनके अनुसार आने वाले पक्षियों की संख्या पिछले साल से कम है। यमुनाजी का अर्थ पवित्र नदी यमुनाजी से है जिसे देश के करोड़ों लोगों में से कुछ को छोड़कर मां का दर्जा देते हैं। काफी लोग नहीं भी मानते होंगे लेकिन कई रास्तों से बहकर आती सूचनाएं बताती हैं कि यमुनाजी बहुत कूड़ा कचरा वाली हालत में हैं।  दशकों की कोशिशें, गहरी योजनाएं और जी तोड़ राजनीतिक मेहनत यमुनाजी को बेहतर हालत में नहीं ला सकी। हो सकता है विदेशी पक्षी इस बात को समझ गए हों।   


उनके कम आने का दोष, ग्लोबल क्लाइमेट चेंज को दे सकते हैं। बाईस किलोमीटर में फैली यमुनाजी के प्रदूषित होने का दूसरा कारण, प्रदूषण को मान सकते हैं क्यूंकि बार बार बताया यही जाता है कि लगभग दो दर्जन नाले यमुनाजी के पानी को घेरे रहते हैं। सुना है वहां कूड़ा कचरा भी विसर्जित किया जा रहा है।  यह भी सुनने में आता रहता है कि विकासजी ने वहां भी विकास करने का राष्ट्रीय ठेका लिया हुआ है जो यमुनाजी को पसंद नहीं आता। लेकिन उसके बस में कुछ नहीं है, पानी में डूबी ज़मीन का निर्जीव टुकड़ा समझदार सक्रिय इंसानों का, बूंद जितना भी बिगाड़ नहीं सकता ।

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यह संभव हो सकता है कि कमबख्त कोहरे के कारण, पक्षियों की गणना उचित तरीके से न हो सकी हो। पक्षियों की गिनती करना मज़ाक नहीं है। पता नहीं यह सही है या गलत, कुछ पक्षियों के भी नखरे  होते हैं। वे प्रदूषित पानी में ज़्यादा समय तक नहीं रह पाते। मनचाहा खाना मुश्किल से मिलता है। यमुनाजी के आसपास फैले कचरे में से खाने के लिए ढूंढना पड़ता है। विदेशी पक्षी हैं, स्थानीय इंसान तो नहीं हैं जो यमुनाजी के गंदगी भरे पानी में नहा लें। पक्षी इंसान की तरह तो हो नहीं सकता, वह भी इंसान की तरह व्यवहार करने लगेगा तो कुदरत के अनुशासन का क्या होगा।   


हमें विदेशी पक्षियों से क्या लेना वे कम आएं या ज़्यादा।  हम तो उनका शिकार भी नहीं कर सकते। हमारे पास तो स्थानीय पशुओं की देखभाल करने का समय नहीं है पक्षियों की बात कौन करे।  हमारे पास दूसरे ज़रूरी सामाजिक काम हैं। वैसे भी देसी या विदेशी पक्षी, प्रकृति के बच्चे हैं। प्रकृति को ही सोचना विचारना चाहिए, ध्यान रखना चाहिए कि उनके बच्चों को कहां जाना चाहिए कहां नहीं । इंसान को कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि वह पक्षी नहीं है। वह तो यमुनाजी में क्रूज और झाग दोनों का मज़ा ले सकता है। हो सकता है भविष्य में पक्षियों को यहां का नया पर्यावरण लुभा ले और यह खबर छपे कि यमुनाजी में प्रवासी पक्षियों की संख्या बढ़ती जा रही है।  


- संतोष उत्सुक

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