बजटजी कैसे हैं (व्यंग्य)

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Prabhasakshi

बजट भविष्य के लिए चाहे जितना सकारात्मक हो लेकिन मध्यम वर्ग और वेतन भोगियों को आज ही राहत चाहिए। जिनके पास नौकरी नहीं उनके बारे कोई नहीं सोचता। किसी ने कहा बजट तो होना ही ऐसा चाहिए जिसमें अपने लिए कुछ तलाशो या समझने की कोशिश करो तो, न तो मिले और न ही समझ में आए।

बजट, सरकार देश और जनता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। कहते हैं ख़ास लोगों के कारण ही देश की पहचान बनती है, आमजन के कारण तो नहीं बनती। वह बात अलग है कि इनके टैक्स देने के कारण ही सरकारी आमदनी होती है लेकिन इन पर खर्च कम किया जाता है। दुनिया को दिखाने के लिए विकास दर ज़रूरी है इसलिए हर सरकार उस पर ध्यान देती है। बजट आने के बाद विपक्षी पार्टी का यह राजनीतिक कर्तव्य है कि बजट को समाज और देश के लिए हानिकारक बताए। मंत्रियों द्वारा बजट को आत्म निर्भर और विकसित राष्ट्र के संकल्प का आधार बताना होता है।  विपक्ष द्वारा देश के वास्तविक संकटों पर ध्यान न देने वाला कहना होता है। कोई कहेगा इस बजट में रोज़गार या नौकरी नहीं, गरीबों और गांव में रहने वालों की समझ से परे है। मंत्री कहेंगे किसानों युवाओं पर केन्द्रित भविष्य का रास्ता है।  

विपक्षी दल की तेज़तर्रार मंत्री को यही कहना चाहिए था कि बजट दिशाहीन, दृष्टिहीन, कर्म हीन, जन विरोधी, महिला विरोधी, किसान विरोधी, शिक्षा विरोधी है। इसमें हमारे प्रदेश के लिए कुछ नहीं है। सरकार के खिलाफ न जा सकने वाले उद्योगपतियों ने नई दिशा, नया रास्ता, नया रोज़गार देने वाला, प्रतिस्पर्धा बढाने वाला, उत्पादन लागत घटाने वाला, पैसों की किल्लत दूर करने वाला और पुराने उद्योगों को बढ़ावा देने वाला बताया। एक ने कहा अमीरों की आय बढाने वाला है। कई बार कहते हैं पर्यटन को लगेंगे पंख, इस बार पढ़ा, पशुपालन और मत्स्य पालन को भी लगेंगे पंख। बुद्धिजीवी माने जाने वालों ने कहा, इस बार बजट में शायरी, कविता, साहित्यिक उदाहरण और महान संतों के विचारों को प्रवेश नहीं करने दिया। भला निवेश और विकास के सामने यह सब कैसे आते। वैसे भी दोनों अलग अलग हैं कैसे साथ में टिकते।  

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बजट भविष्य के लिए चाहे जितना सकारात्मक हो लेकिन मध्यम वर्ग और वेतन भोगियों को आज ही राहत चाहिए। जिनके पास  नौकरी नहीं उनके बारे कोई नहीं सोचता। किसी ने कहा बजट तो होना ही ऐसा चाहिए जिसमें अपने लिए कुछ तलाशो या समझने की कोशिश करो तो, न तो मिले और न ही समझ में आए। बजट के आने पर कई बार बाज़ार भी निराश हो जाता है। केंद्र और राज्य में अलग अलग पार्टी की सरकारों के, दो विरोधी नेताओं के बयान पढ़कर आम आदमी सोचता है मैंने बजट से क्या लेना है यह हैं न दोनों विशेषज्ञ। एक कहेगा काला दिन, दूसरा कहेगा क्रांतिकारी दिन। बजट में उस राज्य सरकार के लिए लड्डू कैसे हो सकते हैं जो विरोधी पार्टी की हो।  एक कहेगा न हवाई सेवा का विस्तार, पर्यटन विकास पैकेज नहीं, झुनझुना थमाया है। दूसरा फरमाएगा, महिला सशक्तिकरण और हर वर्ग के लिए विकास का वायदा किया।

   

आम व्यक्ति यही पूछता है कि उसकी बीमारी की दवा कितने रूपए सस्ती हुई। महिलाएं जानना चाहेंगी, उनका पसंदीदा बैग कितने में पड़ेगा। विदेशी यात्रा कितने प्रतिशत सस्ती हुई। स्मार्ट फोन कितने हज़ार में मिलेगा। बजट की बारीकियों से बजट बनाने वालों ने भी क्या लेना उसके लिए प्रभाव पैदा करने वाले प्रबुद्ध अर्थशास्त्री हैं न। हर सरकार का बजट उच्चकोटि का होता है। सरकारजी ने चुनाव भी जीतने होते हैं। बजट बहुत आदरणीय है आइए आज से बजट की जगह बजटजी कहना शुरू करें।

- संतोष उत्सुक

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