By अभिनय आकाश | Jun 11, 2026
जिस जोजिला दर्रे को भारत ने 1948 की जंग के दौरान अपने कंट्रोल में लिया था वहां आज सबसे लंबी सुरंग का एक अहम पड़ाव पार कर दिया गया है। जोजिला टनल के दोनों सिरों को आज जोड़ दिया गया। लगभग 1000 से ज्यादा इंजीनियर और मजदूर बड़े विपरीत हालातों में इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में जुटे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जंग से जूझ रहे ईरान का भी एक इंजीनियर भारत के इस अहम प्रोजेक्ट का हिस्सा है। जिसका कहना है कि जॉर्जिला टनल का निर्माण भी किसी जंग से कम नहीं। एक धमाका हुआ और टनल के दोनों छोर एक दूसरे से जुड़ गए। देश के दो अहम सामरिक इलाके आपस में कनेक्ट हो गए। दुनिया के सबसे लंबी सिंगल ट्यूब सुरंग जोजिला टनल ने सबसे मुश्किल पड़ाव पार कर लिया है। विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा में एक नए मिल का पत्थर स्थापित हो चुका है।
जोजिला टनल प्रोजेक्ट की शुरुआत 2020 में हुई थी और दोनों तरफ से खुदाई का काम शुरू किया गया था। यानी सोनमर्ग साइड से और मीनामार्ग जो कि कारगिल लद्दाख में पड़ता है और इसी ईस्ट पोर्टल पर हम इस समय मौजूद हैं। यह काफी अहम प्रोजेक्ट था मिनिस्ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट के लिए क्योंकि जम्मू कश्मीर को लद्दाख के साथ जोड़ने के लिए और हर समय हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए यह एकमात्र जरिया है जो जोजिला टर्नल प्रोजेक्ट है। दुनिया के सबसे दुर्गम इलाके में इस प्रोजेक्ट के लिए 1000 से ज्यादा मजदूरों ने 9 साल तक खुदाई की। इस इलाके का मौसम किसी सजा से कम नहीं। यहां तापमान -20° से -30° तक पहुंच जाता है। इस हाल में यहां मजदूर साल में करीब 100 दिन ही काम कर पाते थे। इसके बावजूद अप्रैल 2026 तक इस प्रोजेक्ट में 1 करोड़ से ज्यादा सुरक्षित मैनार्स दर्ज किए गए जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। खासकर भारत के इतने कठिन इलाके में ऐसा पहली बार हुआ है जो कि देश के लिए गर्व करने का मौका देता है।
हमने अह पिछले कई वर्षों में देखा कि किस तरह से आम लोगों को सेना को और कई लोगों को आने-जाने में दिक्कत होती थी। क्योंकि जोजिला जो दर है वो विश्व का सबसे ऊंचा मोटरेबल दर है और वो बर्फबारी की वजह से कई महीनों तक बंद रहता था। यानी 6 महीने लगभग जोजिला पास बंद रहता था और उस समय लोगों को काफी दिक्कत आती थी। आप भी इस समय देख सकते हैं कि किस तरह का वातावरण यहां पे है। आज भी पहाड़ी चोटियां जो हैं वो बर्फ से ढकी हुई हैं और उसके साथ-साथ कठिन परिस्थितियों में इस प्रोजेक्ट को एग्जीक्यूट किया गया। अह हजारों की तादाद में इसमें लेबर्स जो है वह इनवॉल्व थे। मिशनरी और हाईएस्ट टेक्नोलॉजी जो है वो इसका इस्तेमाल यहां पर किया गया और खासतौर पर जो ऑस्ट्रेलियन टनलिंग मेथड है उसका प्रयोग करके इस टनल की खुदाई की गई है और इस प्रोजेक्ट को जो है धीरे-धीरे कंप्लीट किया जा रहा है।
13.15 कि.मी. लंबी मुख्य टनल ऐसी चट्टानों से होकर गुजरती है जिनका स्वरूप 65 से ज्यादा बार बदला। चट्टान और बर्फ से बदलते भूगोल के चलते इंजीनियरों को लगातार अपनी रणनीति में बदलाव लाना पड़ा। इंजीनियरों ने एनएटीएम यानी न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड का इस्तेमाल किया जिसमें खुदाई और सपोर्ट की रणनीति को शॉर्टक्रेट और रॉक बोल्ट्स के जरिए मौके पर ही बदला गया। यह तरीका हिमालय टनल प्रोजेक्ट्स में लोकप्रिय हो रहा है। लेकिन इतनी ऊंचाई और इतने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल पहली बार हुआ है। यकीनन यह राष्ट्र के लिए गर्व करने का विषय है। इस टनल की खासियत यह है कि इसमें अलग से कोई एस्केप टनल नहीं है। इसलिए इंजीनियरों ने वेंटिलेशन और इमरजेंसी निकासी के लिए तीन बड़े वर्टिकल शाफ्ट बनाए हैं। सबसे बड़ा शाफ्ट पश्चिमी छोर पर है और पहाड़ के अंदर 474.3 मीटर गहरा है जो भारत का सबसे गहरा वर्टिकल शाफ्ट है। दूसरा 367.38 मीटर और तीसरा 213.5 मीटर गहरा है। इस टनल को बनाने के दौरान कई बार कुदरत के कहर का सामना करना पड़ा। पांच बड़ी अवलांस की घटनाएं पिछले 5 साल में प्रोजेक्ट साइट पर हुई। हर बार लगा कि प्रोजेक्ट फंस जाएगा लेकिन देश के कर्मवीरों ने हिम्मत नहीं हारी और हर बार उम्मीद की नई किरण जगी और फिर से काम शुरू हुआ।
एक बहुत बड़ा निवेश था जिससे ना सिर्फ जम्मू कश्मीर और लद्दाख की कनेक्टिविटी आपस में बढ़ेगी बल्कि इस प्रोजेक्ट की वजह से सेना को सबसे ज्यादा जो है वो लाभ मिलेगा और स्ट्रेटेजिकली भारतीय सेना किसी भी समय जो है अब मूव कर सकती हैं और बिना किसी जो है दिक्कत के क्योंकि लगातार हमने देखा कि कारगिल युद्ध में जोजिला दर बंद होने की वजह से किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन अब धीरे-धीरे वो तमाम कठिनाइयां दूर होंगी और जो चाइना के साथ लगने वाली सीमा है वो देश के और ज्यादा करीब हो गई है। कई महीने देश से कटे रहने वाला लद्दाख अब महीने देश से जुड़ा रहेगा। 4 से 5 साल की अथक मेहनत के बाद अब लद्दाख और जम्मू कश्मीर के लोगों का सपना साकार होने जा रहा है। देश की सेना के लिए यह बहुत बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके थ्रू वो पूरा इधर-उधर जा सकते हैं। लद्दाख की की तरफ से जा सकते हैं और आपका बालटाल की तरफ से ये टनल जहां से आउट होती है अगर आप लद्दाख से आए तो हमारी कंट्री को सेफ्टी के लिए सिक्योरिटी के लिए हमारी आर्मी हमारी डिफेंस के लिए ये बहुत ही अच्छी बहुत ही एक तरह से वरदान साबित हो रही है और लद्दाख के लोग भी बहुत खुश हैं क्योंकि वो इसके थ्रू बिल्कुल कनेक्ट रह सकते हैं। कश्मीर से अब उनको छ महीने बंद रहने की जरूरत नहीं है। वो 12 महीने तक आवाजावी उनकी रह सकती है। और जहां तक मैं बात करूं इस टनल को बन के आने के लिए इसमें चार से पांच साल हमें लग गए हैं। जोजिला टनल की शुरुआत भारतीय इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है। सालों की मेहनत, जान का जोखिम और फिर एक सपने का साकार हो जाना। इस टनल के सपने के साकार हो जाने के पीछे जिन कर्मवीरों की मेहनत और लगन है उन पर राष्ट्र को गर्व है। ऐसे लोग ही भारत की विकास यात्रा को आगे ले जा रहे हैं जिससे भारत विश्व पटल पर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। जैसे ही नवंबर दिसंबर में भारी बर्फबारी शुरू होती है, लद्दाख का यह हिस्सा देश से कट जाता है। लद्दाख के लोगों को राशन, दवाई, ईंधन, हवाई जहाज से प्रेजना। सेना के सामान की सप्लाई भी काफी हद तक हवाई मार्ग पर ही निर्भर होती है। लेकिन सुरंग का काम मुकम्मल हो जाने से आम लोगों के साथ-साथ सेना को भी बड़ी राहत मिलेगी।