मोदी मंत्रिमंडल आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे युवा और पढ़े लिखे नेताओं की टीम है

By डॉ. नीलम महेंद्र | Jul 14, 2021

मोदी सरकार के मंत्रिमंडल का ताज़ा विस्तार जहां कई उम्मीदों को जगाता-सा दिखता है वहीं वो अपनी कई नाकामियों पर पर्दा डालता भी नज़र आता है। क्योंकि जिस प्रकार से भाजपा के कई दिग्गजों से इस्तीफा लेकर नए चेहरों को सरकार में जगह दी गई है उससे इसे मंत्रिमंडल विस्तार न कहकर मंत्रिमंडल सुधार कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। इतना ही नहीं मिनिमम गवर्नमेंट एंड मैक्सिमम गवर्नेन्स के मंत्र पर चलने वाले प्रधानमंत्री मोदी के इस मंत्रिमंडल विस्तार में 43 मंत्रियों ने शपथ ली है और इसी के साथ मोदी सरकार में मंत्रियों की संख्या 78 तक पहुंच गई है। इस मंत्रिमंडल विस्तार ने कई प्रश्न उत्पन्न किए हैं तो कई संदेश भी दिए हैं।

जिस प्रकार से देश में साधारण एंटीबायोटिक से लेकर जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाज़ारी हुई या फिर ऑक्सिजन की कमी से हज़ारों जानें गईं और अस्पतालों में बिलों के द्वारा लूट का उपक्रम शुरू हुआ, आम आदमी के मन में प्रश्न उठने लगा था कि इस देश में प्रशासन नाम की कोई चीज़ भी है या फिर जंगल राज है।

यह सब विशेष रूप से इसलिए भी निराशाजनक था क्योंकि आम आदमी के साथ यह सब उस सरकार के शासन काल में हो रहा था जिस सरकार को उसने बेहद उत्साह और उम्मीदों के साथ दूसरी बार ऐतिहासिक बहुमत के साथ मौका दिया था। शायद आम जनमानस के हृदय में उपजी यही निराशा इस मंत्रिमंडल विस्तार के अनेक कारणों में से एक कारण रहा हो। क्योंकि मोदी जैसा अनुभवी राजनीतिज्ञ यह अच्छी तरह जानता है कि नोटबन्दी या जीएसटी या फिर पेट्रोल, डीज़ल की बढ़ती कीमतों जैसे विषयों में भले ही लोग अपने नेता की नीयत देखते हों लेकिन जब बात आम आदमी के जीवन, उसके स्वास्थ्य, उसके अस्तित्व पर ही आ जाती है तो वो ही जनमानस नीयत नहीं नतीजे देखता है।

और कोरोना काल के निराशाजनक नतीजे किसी से छिपे नहीं हैं। इस मंत्रिमंडल विस्तार में स्वास्थ्य मंत्री को बदल कर सरकार भले ही यह संदेश देने का प्रयास करे कि जो मंत्री नतीजे नहीं देगा वो हटा दिया जाएगा लेकिन यह संदेश आम आदमी के दिल तक कितना पहुंचता है यह तो समय ही बताएगा।

यही कारण है कि पांच राज्यों में आगामी चुनावों को देखते हुए तमाम राजनैतिक समीकरणों को साधने का लक्ष्य भी इस मंत्रिमंडल विस्तार में छुपा है। इसी को देखते हुए देश के इन प्रदेशों के प्रतिनिधियों को शामिल करने से लेकर अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग को इस मंत्रिमंडल में विशेष रूप से शामिल किया गया। इसके अलावा एनडीए के घटक दलों जैसे जनता दल युनाइटेड, लोकजनशक्ति पार्टी और अपना दल को भी इस कैबिनेट विस्तार में शामिल करके भाजपा ने एनडीए को भी मजबूती प्रदान की है।

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लेकिन राजनीति से इतर अगर इस मंत्रिमंडल विस्तार के सकारात्मक पक्ष की बात की जाए तो यह मंत्रिमंडल शायद आज़ाद भारत के इतिहास में अब तक का सबसे युवा और पढ़े लिखे नेताओं का मंत्रिमंडल है। योग्यता की बात करें तो इसमें सात पीएचडी, तीन एमबीए, तेरह वकील, छह डॉक्टर, पांच इंजीनियर और सात सिविल सेवक मंत्री हैं।

भारत जैसे देश की राजनीति में निश्चित ही यह एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक स्वागतयोग्य बदलाव है। क्योंकि इस देश ने राजनीति में योग्यता के अभाव के बावजूद परिवारवाद अथवा भाई भतीजावाद या फिर वोटबैंक के दम पर अंगूठाछाप से लेकर ऐसे नेताओं को देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे देखा है जिन्होंने अपनी स्कूल की पढ़ाई भी पूरी नहीं की। देश की राजनीति में ऐसे माहौल से जनता त्रस्त थी और राजनेताओं से उनका मोहभंग होने लगा था।

लेकिन इस मंत्रिमंडल में शिक्षित और युवा नेताओं को सरकार में शामिल किया जाना जहां एक ओर आम लोगों के मन में उम्मीद जगाता है तो दूसरी ओर नेताओं को कड़े संदेश भी देता है। इस प्रकार के कदम निश्चित ही देश की राजनीति में सकारात्मक बदलाव लाएंगे। इसके अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण संदेश इस कैबिनेट विस्तार के द्वारा प्रधानमंत्री ने दिया है वो यह कि वो महिला सशक्तिकरण की केवल बात ही नहीं करते बल्कि उस दिशा में ठोस कदम भी उठाते हैं।

वित्त, विदेश और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय महिलाओं के हाथ में देकर वो पहले भी महिलाओं में अपना विश्वास व्यक्त कर चुके थे। इस बार उन्होंने सात मंत्रालय महिलाओं के हाथों में सौंपे हैं और अब कुल 11 महिलाएं वर्तमान सरकार में मंत्री हैं जो महिलाओं के प्रति बदलते दृष्टिकोण का प्रतीक है। तो कहा जा सकता है कि कैबिनेट का यह विस्तार भले ही राजनैतिक नफा नुकसान को ध्यान में रखकर या छवि बदलने की कोशिश में किया गया हो लेकिन इसमें राजनैतिक शुचिता और महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण बदलने जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी विषयों पर जोर देकर वर्तमान राजनीति की दिशा बदलने का एक गंभीर प्रयास भी किया गया है जिसके लिए प्रधानमंत्री बधाई के पात्र हैं। राजनैतिक हितों को साधते हुए इससे बेहतर मंत्रिमंडल विस्तार शायद नहीं हो सकता था।

-डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

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