हालिया टकराव के बाद Iran और खाड़ी देशों का BRICS में होगा आमना-सामना, अब मोदी की कूटनीति देखेगी दुनिया

By नीरज कुमार दुबे | Sep 10, 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से दुनिया को यह संदेश देते रहे हैं कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” अब यही संदेश उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कसौटी बन गया है। एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, दूसरी ओर पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने खाड़ी देशों को भी सीधे संकट में डाल दिया है। ऐसे समय में दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक क्षमता का बड़ा प्रदर्शन भी बनने जा रहा है। ब्रिक्स में रूस, चीन, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर विरोधी हितों वाले देश एक साथ मौजूद होंगे।

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हम आपको यह भी बता दें कि इस दिशा में भारत केवल रूस से बात नहीं कर रहा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर हाल में कीव गए और यूक्रेनी नेतृत्व के साथ बातचीत की थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है और युद्ध को समाप्त करने में उपयोगी विचारों पर काम करने के लिए तैयार है। यानी मोदी सरकार की रणनीति किसी एक पक्ष को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखकर शांति की गुंजाइश बचाए रखने की है।

वहीं पश्चिम एशिया में यही नीति और भी कठिन है। हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के क्रम में बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, जॉर्डन और दूसरे देशों को भी अपनी सैन्य कार्रवाई के दायरे में ला दिया। ईरान का तर्क था कि वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है, लेकिन मिसाइल और ड्रोन उन देशों की संप्रभु सीमाओं के भीतर पहुंचे जहां ये ठिकाने मौजूद हैं। जुलाई में भी ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कार्रवाई जारी रखी।

यहीं मोदी की कूटनीति की असली परीक्षा सामने आती है। युद्ध के बीच उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बातचीत की थी और साफ कहा था कि भारत सभी मुद्दों का समाधान संवाद और कूटनीति से चाहता है। साथ ही उन्होंने ऊर्जा और व्यापार के निर्बाध आवागमन तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भारत की प्राथमिकता बताया। दूसरी ओर उन्होंने यूएई, बहरीन, सऊदी अरब और कतर के नेताओं से अलग-अलग बातचीत कर उनके खिलाफ हुए हमलों की निंदा भी की थी। बहरीन के मामले में प्रधानमंत्री ने सीधे कहा था कि भारत हमलों की निंदा करता है और वहां के लोगों के साथ खड़ा है; सऊदी अरब और यूएई के संदर्भ में भी उन्होंने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन को गंभीरता से लिया था।

यही संतुलन मोदी की विदेश नीति की ताकत है। ईरान से संबंध भी चाहिए और खाड़ी अरब देशों का भरोसा भी; रूस से रणनीतिक साझेदारी भी बचानी है और पश्चिम से आर्थिक-तकनीकी रिश्ते भी मजबूत करने हैं। भारत के लिए यह केवल प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। पश्चिम एशिया में करोड़ों भारतीयों के हित, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सीधे इससे जुड़ी है। मोदी ने ईरान से बातचीत में भी इसी व्यावहारिक प्राथमिकता को सामने रखा है।

साथ ही इस पूरे समीकरण में चीन को अलग करके देखना भी संभव नहीं है। शी जिनपिंग की भारत यात्रा सात वर्ष बाद हो रही है और दोनों देशों के बीच रिश्तों में सावधानी के साथ सुधार की कोशिश दिखाई दे रही है। सीमा पर तनाव कम करना, आर्थिक रिश्तों को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना और प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद बनाए रखना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी है। इसलिए दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन मोदी के लिए केवल शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन का मंच है। एक ही मेज पर पुतिन, शी, पेजेश्कियान, सऊदी और यूएई नेतृत्व के बीच भारत यह दिखा सकता है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ किसी खेमे से दूरी नहीं, बल्कि सभी से अपने हितों के आधार पर संवाद करने की क्षमता है।

देखा जाये तो दुनिया आज अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है। ऐसे समय में मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होने की बजाय सभी से संवाद बनाए रखता है। रूस से युद्ध खत्म करने की अपील हो, यूक्रेन से बातचीत, ईरान से संपर्क, खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते, पश्चिम के साथ साझेदारी या चीन से संवाद, भारत हर मोर्चे पर अपने हितों को साधते हुए रिश्ते आगे बढ़ा रहा है। यही संतुलित कूटनीति भारत को इस उथल-पुथल भरी दुनिया में अपनी स्वतंत्र और मजबूत जगह बनाने में मदद कर रही है।

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