मोदी ने माहौल ही बदल डाला, अब ब्रिटेन जैसी आर्थिक ताकतें भारत से मदद माँग रही हैं

By नीरज कुमार दुबे | Oct 08, 2025

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर का दो दिवसीय भारत दौरा ऐसे समय पर शुरू हुआ है जब वैश्विक आर्थिक और सामरिक संतुलन नई परिभाषाएँ गढ़ रहा है। मुंबई पहुँचे स्टार्मर अपने साथ 125 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल लेकर आए हैं जिनमें प्रमुख उद्योगपतियों, वित्तीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। यह यात्रा केवल औपचारिक नहीं, बल्कि व्यापार और निवेश को नई दिशा देने का प्रयास भी है।

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हम आपको बता दें कि भारत और ब्रिटेन के बीच जुलाई में संपन्न व्यापार समझौता ‘विज़न 2035’ की परिकल्पना पर आधारित है, जो अगले दशक में शिक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु, रक्षा और जनसंपर्क के क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करने का लक्ष्य रखता है। इस समझौते के अंतर्गत ब्रिटेन ने अपने बाज़ार में 99 प्रतिशत उत्पादों पर टैरिफ समाप्त करने की घोषणा की है। हालांकि इसका प्रत्यक्ष लाभ भारतीय निर्यात के लगभग 45 प्रतिशत हिस्से यानि कपड़ा, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, वाहन आदि तक सीमित रहेगा, फिर भी यह भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है।

ब्रिटेन के लिए भी यह सौदा महत्त्वपूर्ण है। विशेषकर स्कॉटलैंड के व्हिस्की उद्योग के लिए टैरिफ 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत और अगले दस वर्षों में 40 प्रतिशत तक लाना एक ऐतिहासिक कदम है। यह कदम ब्रिटेन की घरेलू अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद वैश्विक व्यापार में नई साझेदारियों की खोज की उसकी रणनीति का हिस्सा है। हालाँकि यह समझौता अभी ब्रिटिश संसद की प्रक्रिया में है और 2026 की शुरुआत से पहले लागू नहीं हो पाएगा, फिर भी यह दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में स्थायित्व और दीर्घकालिकता का संकेत देता है। उल्लेखनीय है कि दोनों देशों के बीच वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार लगभग 59 अरब डॉलर का है, और अनुमान है कि अगले पाँच वर्षों में यह दुगना हो सकता है।

देखा जाये तो अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों— विशेषकर इस्पात, औद्योगिक पुर्जों और औषधीय निर्यात पर बढ़ाए गए टैरिफ से भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हुई है। ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौता भारत को न केवल एक वैकल्पिक बाज़ार प्रदान करेगा, बल्कि यूरोप में अपनी उपस्थिति को सशक्त करने का अवसर भी देगा। इसके अतिरिक्त, ब्रिटेन की वित्तीय संस्थाओं— जैसे स्टैंडर्ड चार्टर्ड, बार्कलेज, एचएसबीसी और रोल्स रॉयस जैसी कंपनियों के प्रतिनिधियों का इस यात्रा में शामिल होना इस बात का संकेत है कि ब्रिटेन भारत में दीर्घकालिक निवेश को लेकर गंभीर है। मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कीयर स्टार्मर की संयुक्त उपस्थिति दोनों देशों की डिजिटल और तकनीकी साझेदारी को नया आयाम देगी।

हम आपको याद दिला दें कि भारत–ब्रिटेन संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में एक संवेदनशील मोड़ आया था, विशेषकर जब ब्रिटिश लेबर पार्टी ने कश्मीर मुद्दे पर भारत विरोधी रुख अपनाया था। मगर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने उस रुख को संशोधित करते हुए भारत के साथ ‘विश्वसनीय साझेदारी’ पर बल दिया है। ‘विज़न 2035’ इसी राजनीतिक पुनर्संतुलन का परिणाम है। सुरक्षा दृष्टि से भी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा महत्वपूर्ण है। लंदन में सक्रिय खालिस्तानी समूहों से भारत की सुरक्षा एजेंसियों को जो चुनौतियाँ मिलती रही हैं, उन्हें लेकर दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने की आवश्यकता है। ब्रिटेन की नई टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी इनिशिएटिव में भारत की भागीदारी साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में सहयोग को प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे दक्षिण एशिया में एक संतुलित तकनीकी शक्ति-संतुलन बनेगा।

हालाँकि स्टार्मर की यह यात्रा व्यापारिक दृष्टि से उत्साहजनक है, परंतु आव्रजन नीति को लेकर ब्रिटिश रुख अब भी कड़ा है। स्टार्मर ने स्पष्ट किया है कि मुक्त व्यापार समझौते के बावजूद भारतीय कुशल पेशेवरों के लिए नए वीज़ा अवसर नहीं खोले जाएँगे। यह स्थिति उन भारतीय युवाओं के लिए निराशाजनक है जो ब्रिटेन के आईटी, स्वास्थ्य या वित्तीय क्षेत्र में अवसर तलाश रहे हैं। दरअसल, ब्रिटेन का तर्क है कि वह “व्यवसाय-से-व्यवसाय” निवेश पर अधिक ध्यान देना चाहता है, न कि आव्रजन विस्तार पर। किंतु यह भी सत्य है कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था वर्तमान में श्रमिकों की कमी से जूझ रही है और कई उद्योगपतियों ने चेताया है कि अत्यधिक प्रतिबंधात्मक नीति से लंदन का टैलेंट पूल कमजोर पड़ सकता है। यदि ब्रिटेन वास्तव में वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करना चाहता है, तो उसे संतुलित और पूर्वानुमेय आव्रजन नीति अपनानी होगी।

साथ ही, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में भी नये समीकरण गढ़ सकती है। पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों के साथ ब्रिटेन के संबंध भारत के माध्यम से परोक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। यदि भारत–ब्रिटेन साझेदारी स्थिर और सशक्त होती है, तो ब्रिटेन की दक्षिण एशिया नीति का केंद्र भारत बन जाएगा। इससे क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने की संभावना भी बढ़ेगी। साथ ही ब्रिटेन का यह झुकाव भारत की “इंडो-पैसिफिक रणनीति” के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक सहयोग को भी बल मिलेगा।

देखा जाये तो कीयर स्टार्मर की भारत यात्रा भारत–ब्रिटेन संबंधों में एक नया अध्याय खोल सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह यात्रा प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक है, जहाँ आर्थिक साझेदारी, तकनीकी सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता, तीनों का संगम दिखाई देता है। अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों के बीच ब्रिटेन के साथ यह निकटता भारत को पश्चिमी व्यापारिक ढांचे में एक संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित कर सकती है। हालांकि आव्रजन नीति और सुरक्षा चिंताएँ अभी भी अवरोध की तरह हैं, फिर भी यह यात्रा एक संदेश देती है कि विश्व राजनीति के बदलते परिदृश्य में भारत अब केवल साझेदार नहीं, बल्कि एक निर्णायक केंद्रबिंदु बन चुका है।

यहां यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि ब्रिटेन की घरेलू अर्थव्यवस्था वर्तमान में धीमी विकास दर, उच्च राष्ट्रीय ऋण और उत्पादकता में कमी जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में भारतीय बाजार में अवसर तलाशना ब्रिटेन के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बन गया है। भारतीय उपभोक्ता बाजार का आकार, निर्यात की विविधता और तकनीकी नवाचार की दिशा ब्रिटिश निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत कर रहे हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने व्यापार और निवेश को प्राथमिकता दी है और 125 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत दौरे को केवल औपचारिक नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व वाला मिशन बनाया है।

इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर की जुगलबंदी केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है। वित्त, तकनीक, और वैश्विक व्यापार के मंचों पर दोनों नेताओं की रणनीतिक साझेदारी नए संदेश देती है कि भारत और ब्रिटेन मिलकर वैश्विक आर्थिक और सामरिक परिदृश्य को नया आकार दे सकते हैं। Global Fintech Fest जैसे मंचों पर उनकी साझा उपस्थिति और उच्चस्तरीय वार्तालाप यह संकेत देते हैं कि यह गठबंधन दुनिया के निवेशकों, तकनीकी नवप्रवर्तकों और व्यापारिक समुदाय के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

बहरहाल, वैश्विक राजनीति और आर्थिक शक्तियों का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है। भारत के नेता कभी निवेश और व्यापार की संभावनाओं को तलाशने विदेश जाते थे मगर मोदी युग में भारत एक महाशक्ति के रूप में खड़ा है, जहां ब्रिटेन जैसी परंपरागत आर्थिक ताकतें संभावनाओं की तलाश में बड़े-बड़े प्रतिनिधिमंडल लेकर आ रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेंद्र मोदी की वैश्विक स्तर पर सक्रिय नीति ने भारत को निवेश और रणनीतिक साझेदारियों का आकर्षक केंद्र बना दिया है और ब्रिटिश प्रधानमंत्री की यह यात्रा उसी बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

-नीरज कुमार दुबे

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