Rare Earths को लेकर China का रोज रोज का झँझट खत्म करने की तैयारी में हैं Modi

By नीरज कुमार दुबे | Oct 13, 2025

वैश्विक रणनीति और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के इस युग में “रेयर अर्थ एलिमेंट्स” केवल वैज्ञानिक तत्व नहीं रहे बिल्क् ये अब भू-राजनीतिक शक्ति का स्रोत बन चुके हैं। चीन द्वारा रेयर अर्थ मैग्नेट के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने न केवल अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में हलचल मचा दी है, बल्कि भारत सहित विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को अपनी रणनीतियाँ पुनः परिभाषित करने पर मजबूर कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार अब नेशनल क्रिटिकल मिनरल स्टॉकपाइल (NCMS) कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी में है जो आने वाले वर्षों में भारत की तकनीकी और सामरिक आत्मनिर्भरता का आधार स्तंभ बन सकता है।

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इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन विश्व आपूर्ति का लगभग 85% हिस्सा अभी भी चीन नियंत्रित करता है। जब चीन निर्यात पर रोक लगाता है, तो वैश्विक उद्योगों की नींव डगमगा जाती है। ऐसे में भारत की यह पहल केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि सामरिक आवश्यकता भी है।

हम आपको बता दें कि भारत सरकार अब दो महीने का रेयर अर्थ भंडार तैयार करने की योजना बना रही है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी प्रोत्साहन दिया जाएगा। यह कार्यक्रम “नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन” (NCMM) के अंतर्गत शुरू होगा, जिसके तहत पहले से ही 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस पहल का पहला लक्ष्य रेयर अर्थ तत्वों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि देश में रेयर अर्थ मैग्नेट उत्पादन को गति मिल सके। इसके लिए सरकार ने पहले ही 7,300 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन कार्यक्रम को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य अगले पांच वर्षों में 6,000 टन उत्पादन हासिल करना है।

सरकार का इरादा भविष्य में इस दायरे को अन्य महत्वपूर्ण खनिजों— जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट तक विस्तारित करने का भी है। हम आपको बता दें कि भारत में रेयर अर्थ की उपलब्धता का अनुमान लगभग 7.23 मिलियन टन रेयर अर्थ ऑक्साइड का है, जो मुख्यतः 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट अयस्क में पाया जाता है। ये अयस्क आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में फैले हुए हैं।

हालांकि, असली चुनौती इन तत्वों को निकालने और शुद्ध करने की तकनीकी क्षमता की है। वर्तमान में भारत अपने घरेलू भंडारों से इन तत्वों का सीमित उपयोग करता है और प्रोसेसिंग के लिए बड़े पैमाने पर चीन और अन्य देशों पर निर्भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को यदि वास्तविक आत्मनिर्भरता हासिल करनी है, तो केवल भंडारण नहीं, बल्कि प्रसंस्करण और परिष्करण तकनीकों में निवेश करना होगा।

देखा जाये तो चीन के कदम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “खनिज कूटनीति” आने वाले दशकों में ऊर्जा और रक्षा नीति का नया मोर्चा बनेगी। अमेरिका ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और चीनी आयात पर 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। भारत के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है। यदि भारत समय रहते अपनी तकनीकी क्षमता विकसित कर लेता है और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों— जैसे ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, ब्राज़ील या अफ्रीकी देशों से साझेदारी करता है, तो वह न केवल अपनी घरेलू जरूरतें पूरी कर सकेगा बल्कि एशिया में एक सप्लाई हब के रूप में उभर सकता है।

हम आपको बता दें कि खनिज मंत्रालय ने अब तक पाँच चरणों में 55 रणनीतिक और महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की नीलामी की है, जिनमें से 34 सफलतापूर्वक आवंटित किए जा चुके हैं। छठा चरण हाल ही में आरंभ हुआ है। यह निरंतरता दर्शाती है कि भारत अब खनिज नीति को केवल संसाधन-शोधन तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक नीति के साथ जोड़ रहा है। हम आपको बता दें कि रेयर अर्थ केवल ‘भू-संसाधन’ नहीं हैं बल्कि ये भारत के मेक इन इंडिया और ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन की आत्मा हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा, और रक्षा उपकरणों के लिए ये तत्व उतने ही जरूरी हैं जितना तेल किसी अर्थव्यवस्था के लिए।

देखा जाये तो भारत का यह कदम समयोचित और दूरदर्शी है। जब चीन जैसी ताकतें आपूर्ति को कूटनीतिक हथियार बना रही हैं, तब भारत अपनी स्वतंत्र आपूर्ति व्यवस्था और भंडारण नीति के माध्यम से “सप्लाई सिक्योरिटी” का मजबूत ढांचा तैयार कर रहा है। फिलहाल मात्र दो महीने का भंडार और सीमित क्षमता एक शुरुआत है, लेकिन दिशा स्पष्ट है। यह उस भारत की झलक है जो हर संकट को अवसर में बदलना जानता है। रेयर अर्थ के इस दौर में भारत ने संदेश दिया है- “खनिज भी अब रणनीति हैं और आत्मनिर्भरता ही सर्वोच्च कूटनीति है।''

-नीरज कुमार दुबे

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