By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 01, 2026
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने प्रयागराज में 2025 के महाकुंभ के दौरान सुर्खियों में आई एक युवती को राहत देते हुए उसकी जन्मतिथि बदलने संबंधी मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) का आदेश बुधवार को निरस्त कर दिया। अदालत ने सीएमओ को निर्देश दिया कि वह युवती को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के बाद, उसके पिता की ओर से जन्मतिथि में बदलाव के लिए दिए गए आवेदन पर कानून के अनुसार नए सिरे से फैसला करे। न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह ने युवती और उसके पति की ओर से दायर रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि युवती की जन्मतिथि में बदलाव के लिए उसके पिता द्वारा दिए गए आवेदन के बारे में उसे सूचित नहीं किया गया और उसे सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया।
याचिका में कहा गया कि इस जोड़े के अंतरधार्मिक विवाह के बाद युवती का मूल जन्म प्रमाण-पत्र बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए निरस्त कर दिया गया। इसके बाद युवती के पिता की शिकायत पर उसके पति के खिलाफ महेश्वर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई। यह प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2) (अपहरण), धारा 81 (छलपूर्वक विवाह अथवा विवाह का विश्वास दिलाकर यौन संबंध), धारा 83 (नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर ले जाना) और धारा 87 (अपहरण या व्यपहरण), बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम की धारा 9 (वयस्क पुरुष द्वारा बाल विवाह) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के संबद्ध प्रावधानों के तहत दर्ज की गई थी।
याचिका के मुताबिक इस जोड़े ने 11 मार्च को केरल के एक मंदिर में विवाह किया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि शादी के बाद युवती के परिजनों ने इस रिश्ते का विरोध किया और उसके मूल जन्म प्रमाण-पत्र को बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए निरस्त करा दिया ताकि विवाह के समय उसे नाबालिग साबित किया जा सके। याचिका में कहा गया कि युवती की वास्तविक जन्मतिथि एक जनवरी 2008 है और महेश्वर नगर परिषद द्वारा जारी उसके जन्म प्रमाण-पत्र के साथ ही आधार कार्ड, पैन कार्ड तथा अन्य सरकारी दस्तावेजों में भी यही जन्मतिथि दर्ज है।
दंपति ने यह भी आरोप लगाया कि बदले गए रिकॉर्ड के आधार पर युवती के पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई और उनके अंतरधार्मिक विवाह को ‘लव जिहाद’ से जोड़कर सांप्रदायिक रंग दिया गया, जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया। राज्य सरकार और युवती के पिता के वकीलों ने दंपति की याचिका पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि महेश्वर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रसूति रजिस्टर के अनुसार युवती की वास्तविक जन्मतिथि 30 दिसंबर 2009 है, जिससे स्पष्ट है कि विवाह के समय वह नाबालिग थी।
वकीलों ने कहा कि युवती का पूर्व में जारी जन्म प्रमाण-पत्र केवल माता-पिता के अनुमान पर आधारित हलफनामे के आधार पर जारी किया गया था और अस्पताल का वास्तविक रिकॉर्ड प्राप्त होने के बाद उसे नियम-कायदों के अनुसार संशोधित किया गया। वकीलों ने यह भी कहा कि यह मामला तथ्यों के गंभीर विवाद से जुड़ा है, जिसका निपटारा दंपति द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका के जरिये नहीं हो सकता। युवती और उसके पति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा ने पैरवी की।