Bangladesh की जनता का गुस्सा फिर से सड़कों पर दिख रहा, अपने खिलाफ प्रचंड प्रदर्शन देखकर दुबक गये Muhammad Yunus

By नीरज कुमार दुबे | Feb 07, 2026

बांग्लादेश की राजधानी ढाका एक बार फिर उबल पड़ी जब अंतरिम शासन के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के खिलाफ सरकारी कर्मचारियों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। सैकड़ों कर्मचारी नौवां राष्ट्रीय वेतनमान लागू करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे और तीखे नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पेट में अन्न नहीं, विकास केवल बातों में है और अन्याय का हिसाब खून से होगा।

सबसे तीखे टकराव जामुना के बाहर हुए जहां कम से कम चालीस लोग घायल बताए गए। जब भीड़ ने बैरिकेड तोड़े तो लाठी चलानी पड़ी। इस विरोध में इंकिलाब मंच नाम का राजनीतिक समूह भी कूद पड़ा, जो यूनुस के विरोध के लिए पहले से जाना जाता है। उसके सह संस्थापक शरीफ उस्मान हादी की 18 दिसंबर को मौत हो गई थी, जिन्हें ढाका में सिर में गोली लगी थी। इंकिलाब मंच संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है और उसी मांग के साथ वह सरकारी कर्मचारियों के साथ जुड़ गया।

जामुना से हटाए जाने के बाद प्रदर्शनकारी दोपहर के आसपास एक बड़े अंतरराष्ट्रीय होटल के पास फिर जमा हुए और नारेबाजी जारी रखी। वहां से जामुना की ओर जाने वाले रास्तों पर अतिरिक्त बल तैनात किया गया। हालात पर नजर रखने के लिए पुलिस महानिरीक्षक बहारुल आलम और ढाका महानगर पुलिस आयुक्त शेख सज्जात अली समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। सुरक्षा घेरे के बीच विरोध सीमित रूप में चलता रहा।

हम आपको बता दें कि विरोध का मूल कारण नौवां राष्ट्रीय वेतनमान है। हाल ही में वेतन आयोग ने नई सिफारिशें दी हैं, पर उन्हें अभी राजपत्र में जारी नहीं किया गया। कर्मचारियों को डर है कि अगर फैसला भावी निर्वाचित शासन पर छोड़ दिया गया तो लागू होने में फिर देर होगी। प्रस्तावित ढांचे में न्यूनतम वेतन बीस हजार टका और उच्चतम वेतन एक लाख साठ हजार टका रखने की बात है। इससे पहले 2015 के आठवें वेतनमान में न्यूनतम वेतन आठ हजार दो सौ पचास टका और उच्चतम वेतन 78 हजार टका था। नया ढांचा न्यूनतम और उच्चतम वेतन के अंतर को कम कर असमानता घटाने का दावा करता है।

यह सब ऐसे समय हो रहा है जब देश चुनाव की ओर बढ़ रहा है। यूनुस प्रशासन ने कहा कि कई विदेशी पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक देश में पहुंच चुके हैं, इसलिए नागरिक शांति और जिम्मेदारी दिखाएं ताकि शांतिपूर्ण चुनाव संभव हो सके। पर सड़क पर उमड़ा गुस्सा बताता है कि जमीन पर बेचैनी गहरी है।

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देखा जाये तो ढाका की सड़कों पर उठा यह धुआं केवल आंसू गैस का नहीं, शासन के भरोसे के जलने का धुआं है। जब सरकारी कर्मचारी, जो किसी भी देश की रीढ़ होते हैं, खुले टकराव पर उतर आएं तो समझ लेना चाहिए कि असंतोष सीमा पार कर चुका है। यूनुस की छवि विश्व मंच पर भले सधी हुई दिखे, पर घरेलू मोर्चे पर दरारें साफ दिख रही हैं। जामुना के बाहर सीधा विरोध प्रतीक है कि सत्ता का केंद्र अब सवालों के घेरे में है। इंकिलाब मंच जैसे समूहों का जुड़ना इस आग में राजनीतिक घी डाल रहा है। शरीफ उस्मान हादी की मौत की निष्पक्ष जांच की मांग ने विरोध को भावनात्मक धार दे दी है।

इस घटनाक्रम का सामरिक महत्व भी कम नहीं है। बांग्लादेश हिंद महासागर क्षेत्र, बंगाल की खाड़ी और दक्षिण एशिया की राजनीति में अहम कड़ी है। वहां अस्थिरता का असर सीमाओं, व्यापार, समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय संतुलन पर पड़ता है। यदि चुनाव से पहले अविश्वास बढ़ा, तो आंतरिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा और राज्य तंत्र की क्षमता पर चोट लगेगी। एक कमजोर प्रशासन न तो अर्थव्यवस्था संभाल पाता है, न सुरक्षा। देखा जाये तो समाधान सीधा है पर साहस मांगता है। वेतनमान पर साफ समय सीमा, पारदर्शी निर्णय और हादी मामले पर विश्वसनीय जांच से ही भरोसा लौटेगा। डंडे और ध्वनि बम से भीड़ हट सकती है, असंतोष नहीं। अगर शासन ने संकेत नहीं समझे तो यह चेतावनी कल बड़े संकट में बदल सकती है। लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं, न्याय और उत्तरदायित्व से चलता है। ढाका की सड़कें यही याद दिला रही हैं।

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