रक्षा मंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव ने ही लिया था बड़ा फैसला, जिस कारण शहीदों के घर तक पहुंचता है उनका पार्थिव शरीर

By अंकित सिंह | Oct 10, 2022

देश की सियासत के वरिष्ठ राजनेता मुलायम सिंह यादव का आज निधन हो गया है। उनके निधन से हर तरफ शोक की लहर है। राजनेता हो या फिर कोई आम जनता, हर कोई मुलायम सिंह यादव के निधन पर शोक व्यक्त कर रहा है। कुछ राजनेता तो उन्हें जन नेता बता रहे हैं और उनके जमीन से जुड़े रहने वाली आदत को याद कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव पहलवानी का शौक रखते थे। बाद में वे शिक्षक बने। राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण सेवा प्रभावित होने के बाद राजनीति में आए। महज 28 वर्ष की उम्र में वह विधायक बन गए। मुलायम सिंह यादव 10 बार विधायक रहे हैं जबकि 7 बार सांसद रहे हैं। कभी उन्हें प्रधानमंत्री पद का मजबूत दावेदार माना जाता था। 1996 से 98 तक वह देश की रक्षा मंत्री रहे। रक्षा मंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव ने कई बड़े फैसले लिए थे। लेकिन उनका एक फैसला आज भी काफी सराहनीय है। 

दरअसल, देश की सीमा पर तैनात रहने वाले जवानों को लेकर उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया था। उस वक्त तक किसी शहीद का जवान उसके घर नहीं पहुंचता था। उस वक्त शहीद जवानों की टोपी ही उनके घर पहुंचाई जाती थी। हालांकि, मुलायम सिंह यादव ने इस परिपाटी को बदला। वे कानून लेकर आए। इसको अमल में लाया गया। इसी कानून के बनने के बाद से कोई भी सैनिक अगर शहीद होता है तो उसका शव सम्मान के साथ उसके पैतृक घर तक पहुंचाया जाता है। इतना ही नहीं, उसका अंतिम संस्कार भी राजकीय सम्मान के साथ होता है। जिला के डीएम और एसपी भी मौजूद रहते हैं। मुलायम सिंह यादव के रक्षा मंत्री रहने के दौरान ही भारत ने sukhoi-30 विमान में बड़ी डील की थी। 

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एक परिचय

उत्तर प्रदेश के इटावा स्थित सैफई में 22 नवंबर 1939 को जन्मे यादव का कुनबा देश के सबसे प्रमुख राजनीतिक खानदानों में गिना जाता है। वह वर्ष 1989, 1991, 1993 और 2003 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और 1996 से 98 तक देश के रक्षा मंत्री भी रहे। समाजवादी पार्टी को शिखर पर पहुंचाने के बाद वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर यादव ने अपनी गद्दी अपने बेटे अखिलेश यादव को सौंप दी। यादव ने अपने राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे। हर सफलता और विफलता में वह सपा कार्यकर्ताओं के नेताजी के तौर पर स्थापित रहे। मुलायम सिंह ने राजनीति की सभी संभावनाओं की थाह ली थी। वह अलग-अलग दौर में लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल, भारतीय लोक दल और समाजवादी जनता पार्टी से भी जुड़े रहे।

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