Prabhasakshi NewsRoom: Bihar Election Results पर Murli Manohar Joshi ने किया कटाक्ष, बोले- चुनाव में पैसे बाँटने से जनता का कल्याण नहीं होता

By नीरज कुमार दुबे | Nov 21, 2025

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा है कि सिर्फ चुनावों के दौरान पैसा बांटना कल्याण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को सही मायनों में मजबूत करने के लिए आर्थिक समानता, समान विकास और राजनीतिक अधिकारों के बराबर इस्तेमाल की जरूरत है। डॉ. जोशी का यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार में एनडीए की जीत के पीछे सबसे बड़ा कारण सरकारी योजना के तहत महिलाओं को दस हजार रुपए की राशि हस्तांतरित किया जाना बताया जा रहा है।

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उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से बिहार चुनावों का जिक्र करते हुए कहा कि आज यह सवाल उठ रहा है कि पैसा कल्याण के लिए था या vote-buying। समाधान के तौर पर जोशी ने भारत को छोटे-छोटे राज्यों में पुनर्गठित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि लगभग 70 राज्य हों जिनमें जनसंख्या और विधानसभा सीटें लगभग बराबर हों। इससे विकास और संसाधनों के समान वितरण को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने देरी से हो रही जनगणना और उसके आधार पर होने वाली परिसीमन प्रक्रिया पर भी चिंता जताई और कहा कि भेदभाव मिटाने के लिए इसे दुरुस्त करना आवश्यक है।

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ने बिहार चुनाव परिणामों को लेकर सत्तारुढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और विपक्ष के बीच वाकयुद्ध का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए कहा, ‘‘जैसे आज लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आपने चुनावों से पहले पैसा बांटा। सरकार कहती है कि उसने यह पैसा कल्याण के लिए दिया। वे कहते हैं नहीं, आपने वोट खरीदने के लिए पैसा बांटा।’’ जोशी ने कहा कि इस समस्या का समाधान पंडित दीनदयाल उपाध्याय के उस प्रस्ताव में निहित है, जिसमें उन्होंने एक बार कहा था कि ‘‘छोटे राज्य होने चाहिए।''

देखा जाये तो डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने जो कहा, वह उस राजनीतिक वर्ग के लिए एक आईना है जिसके लिए वेलफेयर का मतलब चुनावी मौकापरस्ती बन चुका है। सत्ता में बैठे लोग जब हर चुनाव से पहले हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार की नोटों की बरसात कर देते हैं, तो उसे कल्याण कहना जनता का अपमान है। यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का वह विकृत मॉडल है जिसमें गरीबी एक वोट-बैंक और नागरिक एक लेन-देन की वस्तु बन कर रह गया है। जोशी का सवाल सीधा है- वोट तो सबका बराबर है, पर वोटर की आर्थिक ताकत बराबर क्यों नहीं है? यह सवाल भाजपा, कांग्रेस, क्षेत्रीय दल, सबकी असहजता का कारण बनेगा, क्योंकि सबने कभी न कभी नोटों और लुभावने नारों पर चुनाव लड़े हैं।

साथ ही राज्यों को छोटे करने का जो प्रस्ताव उन्होंने रखा है वह राजनीतिक रूप से विस्फोटक है लेकिन प्रशासनिक रूप से तर्कसंगत है। भारत में यह चर्चा हमेशा सत्ता के समीकरण बिगाड़ने के डर से दबा दी जाती है। जोशी की टिप्पणी सत्ता के गलियारों में गूंज जरूर पैदा करेगी, क्योंकि यह उस मूलभूत सच्चाई को उघाड़ती है जिसे हर सरकार छिपाना चाहती है। देखा जाये तो लोकतंत्र को केवल वोट से नहीं, बराबरी से चलाया जाता है। अब सवाल यह है कि क्या राजनीतिक पार्टियाँ इस चुनौती को स्वीकार करेंगी या फिर चुनावी घोषणाओं और कैश-ट्रांसफर की प्रतियोगिता में जनता को हमेशा ‘सस्ता सौदा’ समझती रहेंगी? बहरहाल, एक सच्चाई तय है कि जब तक आर्थिक समानता नहीं, तब तक लोकतंत्र केवल संख्या का खेल रहेगा, न्याय का नहीं।

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