By रेनू तिवारी | Jul 10, 2026
महाराष्ट्र के नासिक की एक विशेष अदालत ने सूचना प्रौद्योगिकी (IT) कंपनी से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल धर्मांतरण मामले की मुख्य आरोपी निदा खान को जमानत दे दी है। अदालत का यह आदेश इस समय कानूनी और सामाजिक गलियारों में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि जमानत मंजूर करते समय विशेष न्यायाधीश ने जेल में भगवान कृष्ण के जन्म की ऐतिहासिक कहानी का संदर्भ दिया। गौरतलब है कि आरोपी महिला वर्तमान में पांच महीने की गर्भवती है।
कोर्ट ने भगवान कृष्ण का ज़िक्र क्यों किया?
इस हफ़्ते ज़मानत देते हुए स्पेशल जज के.जी. जोशी ने जेल में भगवान कृष्ण के जन्म का ज़िक्र किया और कहा कि किसी भी बच्चे को जेल के अंदर पैदा होने के सदमे या सामाजिक कलंक का सामना नहीं करना पड़ना चाहिए। कोर्ट ने कहा,
"यह निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता, निदा, पांच महीने की गर्भवती हैं। भगवान कृष्ण की तरह, किसी भी बच्चे को जेल में पैदा होने से जुड़े सदमे या सामाजिक कलंक को नहीं झेलना चाहिए। ऐसी दुखद स्थिति से बचने और नवजात बच्चे के स्वागत और समग्र कल्याण को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता-आरोपी के पक्ष में न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना उचित होगा।" उनकी ज़मानत अर्ज़ी मंज़ूर करते समय कोर्ट ने यह बात कही।
जांच पूरी, चार्जशीट दाखिल
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है। आदेश के अनुसार, अन्य आरोपियों के विपरीत, देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले में निदा खान के ख़िलाफ़ केवल एक चार्जशीट दाखिल की गई है।
इसके विपरीत, मामले में सात अन्य आरोपियों का सामना 26 मार्च से 3 अप्रैल के बीच दर्ज कुल नौ FIR से हो रहा है। जांचकर्ताओं का आरोप है कि निदा खान ने धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत अपने सहकर्मियों को बुर्के और धार्मिक किताबें बांटीं और उनके मोबाइल फ़ोन पर धार्मिक एप्लिकेशन इंस्टॉल करने में मदद की।
कोर्ट के आदेश ने क्यों सबका ध्यान खींचा?
ज़मानत के आदेश ने लोगों का ध्यान इसलिए खींचा है क्योंकि निदा खान पर हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक बातें कहने के आरोप हैं। FIR के मुताबिक, उन्होंने भगवान कृष्ण के बारे में भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं।
इस माहौल में, ज़मानत देते समय कोर्ट का भगवान कृष्ण के जन्म की कहानी का ज़िक्र करना इस आदेश को खास बनाता है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि कोर्ट ने यह बात अजन्मे बच्चे की भलाई की रक्षा और न्यायिक विवेक के इस्तेमाल को समझाने के संदर्भ में कही थी। इन टिप्पणियों का मतलब आरोपों की सच्चाई पर कोई फैसला सुनाना नहीं है; आरोपों पर अभी ट्रायल होना बाकी है।
ज़मानत आदेश का कानूनी महत्व
ज़मानत मिलने से आरोपी के दोषी या निर्दोष होने का फैसला नहीं होता। यह एक न्यायिक फ़ैसला है जो कई बातों पर आधारित होता है, जैसे जांच किस चरण में है, आरोपों की प्रकृति क्या है, सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना, मानवीय आधार और अन्य कानूनी सिद्धांत। इस मामले में ट्रायल जारी रहेगा और कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों के आधार पर आरोपी पर लगे आरोपों की जांच की जाएगी।
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