Prabhasakshi NewsRoom: Operation Tutari होने वाला है 'कामयाब', Prithviraj Chavan बोले Sharad Pawar की पार्टी के 5-6 सांसद 'बेचैन' हैं

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पृथ्वीराज चव्हाण का कहना है कि शरद पवार की पार्टी के पांच से छह सांसद बेचैन हैं और उन पर केंद्र की ओर से भारी दबाव है। उनका दावा है कि जिस तरह उद्धव ठाकरे की शिवसेना को कमजोर किया गया, उसी तरह का घटनाक्रम अब शरद पवार की पार्टी के साथ भी हो सकता है।

शरद पवार की पार्टी के पांच से छह सांसदों के पाला बदलने को लेकर उठी नई अटकलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संसद के मॉनसून सत्र से पहले विपक्ष को एक और बड़ा झटका मिलने वाला है। दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के ताजा दावे ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है कि अब निशाने पर शरद पवार की पार्टी है और सियासी गलियारों में इसे "तुतारी अभियान" का नाम दिया जा रहा है।

पृथ्वीराज चव्हाण का कहना है कि शरद पवार की पार्टी के पांच से छह सांसद बेचैन हैं और उन पर केंद्र की ओर से भारी दबाव है। उनका दावा है कि जिस तरह उद्धव ठाकरे की शिवसेना को कमजोर किया गया, उसी तरह का घटनाक्रम अब शरद पवार की पार्टी के साथ भी हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि यह सांसद आखिर किस दल में जाएंगे, इस पर वह कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते, लेकिन उनकी बेचैनी की चर्चा राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ चुकी है।

इस दावे को और बल तब मिला जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सांसद अमोल कोल्हे ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी कि यदि सत्तारुढ़ महायुति की ओर से प्रस्ताव आता है तो वह उस पर विचार करेंगे। इस एक बयान ने विपक्षी खेमे की बेचैनी बढ़ा दी है। यदि सचमुच पांच या छह सांसद पाला बदलते हैं तो महाराष्ट्र की राजनीति में विपक्ष की बची खुची ताकत को भी गहरी चोट लग सकती है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का संख्याबल और राजनीतिक आत्मविश्वास दोनों मजबूत होंगे।

दिलचस्प बात यह है कि इसी बीच शरद पवार और एकनाथ शिंदे की विधान भवन में हुई शिष्टाचार मुलाकात ने भी राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया। उद्धव ठाकरे खेमे के नेता संजय राउत ने इसे लेकर खुली नाराजगी जताई और कहा कि इससे उन लोगों का सम्मान बढ़ता है जिन्हें उनकी पार्टी अपने टूटने का जिम्मेदार मानती है। वहीं पृथ्वीराज चव्हाण ने हालांकि इस मुलाकात का बचाव करते हुए कहा कि राजनीति में वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन व्यक्तिगत संबंध बनाए रखने में कोई बुराई नहीं है। उन्होंने यह भी माना कि शिवसेना का आहत होना स्वाभाविक है क्योंकि उसकी पीड़ा अलग है। इस बयान ने साफ कर दिया कि महा विकास आघाड़ी के भीतर भी भरोसे की डोर पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है।

इसी बीच एक और दिलचस्प परत सामने आई है। लंबे समय से यह चर्चा चल रही है कि शरद पवार की पार्टी का कांग्रेस में विलय हो सकता है। लेकिन कांग्रेस के ही कई वरिष्ठ नेताओं ने इस संभावना पर आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो महाराष्ट्र कांग्रेस में शरद पवार और सुप्रिया सुले का प्रभाव बढ़ जाएगा और मौजूदा प्रदेश नेतृत्व हाशिये पर चला जाएगा। यानी विपक्ष केवल बाहर से ही नहीं, भीतर से भी कई मोर्चों पर उलझा हुआ दिखाई दे रहा है।

इसके अलावा, पृथ्वीराज चव्हाण ने यह भी कहा कि यदि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को संसद में दो तिहाई बहुमत मिल गया तो वह अपनी वैचारिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं को तेजी से आगे बढ़ा सकता है। उन्होंने संविधान, परिसीमन और बड़े संवैधानिक फैसलों को लेकर आशंकाएं व्यक्त कीं। अब सबकी नजर 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मॉनसून सत्र पर टिक गई है। यदि उससे पहले विपक्षी दलों के कुछ और सांसद सत्ता पक्ष के साथ चले जाते हैं तो संसद का पूरा राजनीतिक गणित बदल सकता है।

देखा जाये तो महाराष्ट्र लंबे समय से राजनीतिक प्रयोगशाला बना हुआ है। यहां पहले शिवसेना टूटी, फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विभाजित हुई और अब यदि शरद पवार की पार्टी के सांसद भी बड़ी संख्या में पाला बदलते हैं तो यह केवल एक राज्य का घटनाक्रम नहीं रहेगा। इसका सीधा असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई देगा। विपक्ष की एकजुटता पर नए सवाल उठेंगे, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और मजबूत होकर उभरेगा।

बहरहाल, फिलहाल यह तय नहीं है कि "तुतारी अभियान" केवल राजनीतिक चर्चा है या जल्द सामने आने वाली वास्तविकता। लेकिन इतना स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की राजनीति अभी शांत होने वाली नहीं है। मॉनसून सत्र से पहले की यह खामोशी दरअसल किसी बड़े राजनीतिक खेल की प्रस्तावना भी हो सकती है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्या भारतीय राजनीति का अगला बड़ा अध्याय महाराष्ट्र से ही लिखा जाने वाला है।

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