By नीरज कुमार दुबे | Jul 14, 2026
एनसीपी के दोनों धड़ों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष या सत्तापक्ष से नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर से खड़ी होती दिख रही है। एक ओर शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी-एसपी में विधायक खुले तौर पर पार्टी की राजनीतिक दिशा बदलने का दबाव बना रहे हैं, तो दूसरी ओर दिवंगत अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है।
इस विवाद के बीच प्रफुल पटेल का बयान भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि अजित पवार के निधन के बाद पार्टी में बड़ा खालीपन पैदा हुआ है और उसे भरना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। माना जा रहा है कि सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में उनके पुत्र पार्थ पवार का बढ़ता प्रभाव भी कई वरिष्ठ नेताओं को असहज कर रहा है। कम राजनीतिक अनुभव के बावजूद पार्थ की बढ़ती भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
उधर, शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी-एसपी भी कम संकट में नहीं है। पार्टी के दस विधायकों में से कम से कम पांच विधायक नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं कि विपक्ष में बने रहने की बजाय सत्तारुढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बना जाए। इन विधायकों का तर्क है कि सत्ता के साथ रहने पर उनके क्षेत्रों के लिए विकास निधि और प्रशासनिक मंजूरियां आसानी से मिल सकेंगी। कई विधायक यह भी मानते हैं कि पार्टी का मौजूदा राजनीतिक रुख लगातार भ्रम पैदा कर रहा है। कभी सरकार के खिलाफ खुलकर विरोध नहीं किया जाता तो कभी मतदान से दूरी बनाई जाती है। ऐसे में विपक्ष में बने रहने का औचित्य कमजोर पड़ रहा है।
शरद पवार ने अब तक इस पूरे विवाद पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है। उनकी चुप्पी ने अटकलों को और हवा दे दी है। हालांकि कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में जाने की संभावना से इंकार किया है, लेकिन पार्टी के भीतर दबाव लगातार बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल भी अनौपचारिक बैठकों में यह स्वीकार कर चुके हैं कि पार्टी के लगभग आधे विधायक सत्ता पक्ष के साथ जाने के पक्ष में हैं।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि पार्टी विपक्षी गठबंधन में बनी रहती है तो उसका कांग्रेस में विलय हो सकता है। लेकिन कांग्रेस का रुख इससे अलग बताया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व सीधे विलय की बजाय चुनिंदा सांसदों और विधायकों को अलग-अलग समय पर अपने साथ लाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसके पीछे संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की चिंता बताई जा रही है, क्योंकि पूरी पार्टी के विलय की स्थिति में बड़े नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देनी पड़ सकती हैं।
इस बीच शरद पवार की हाल की राजनीतिक मुलाकातों ने भी अटकलों को और तेज कर दिया है। महाराष्ट्र कर्नाटक सीमा विवाद से जुड़ी बैठक के दौरान उनका अचानक उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यालय पहुंचना और बाद में जयंत पाटिल का भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े से मिलना कई सवाल खड़े कर गया। इन मुलाकातों से शिवसेना उद्धव गुट भी असहज नजर आया। संजय राउत ने कहा कि शरद पवार अपनी पार्टी के बारे में जो फैसला लें, वह उनका अधिकार है, लेकिन एकनाथ शिंदे के कार्यालय में जाकर बैठक करना शिवसेना को पीड़ा पहुंचाने वाला कदम है। दूसरी ओर महाराष्ट्र कांग्रेस का कहना है कि उसे भरोसा है कि शरद पवार ऐसा कोई फैसला नहीं करेंगे जिससे उनकी धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील छवि को नुकसान पहुंचे।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि एनसीपी के दोनों धड़े इस समय अलग अलग मोर्चों पर गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। एक ओर सुनेत्रा पवार को अपने ही संगठन के भीतर वैधता की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर शरद पवार अपने विधायकों की बढ़ती बेचैनी और राजनीतिक भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों से घिरे हुए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बदलते राजनीतिक हालात और संगठनात्मक संकट आखिरकार एनसीपी के दोनों धड़ों को फिर से एक मंच पर आने के लिए मजबूर करेंगे, या फिर यह अंदरूनी संघर्ष पार्टी को और अधिक कमजोर कर देगा?