By नीरज कुमार दुबे | Sep 02, 2026
हिमालयी देश नेपाल इस समय भीषण प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। बाढ़ और ग्लेशियर से उत्पन्न विनाशकारी सैलाब ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली, हजारों को लापता कर दिया और सड़क, पुल, बस्तियों तथा जलविद्युत परियोजनाओं को तहस-नहस कर दिया। इस त्रासदी के बीच नेपाल ने अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़ा और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा उठाया है। यह मुद्दा है जलवायु परिवर्तन के लिए मुआवजे और ‘क्लाइमेट जस्टिस’ की मांग।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाली विदेश मंत्री ने चीन, भारत और अमेरिका का नाम लेते हुए उन्हें दुनिया के बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में शामिल बताया और कहा कि बड़े उत्सर्जक देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी बनती है कि वे नेपाल जैसे संवेदनशील देशों को क्षतिपूर्ति दें। हालांकि, 2025 की वैश्विक उत्सर्जन रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका, भारत, यूरोपीय संघ, रूस और इंडोनेशिया 2024 में प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में रहे। दूसरी ओर भारत लगातार ‘क्लाइमेट इक्विटी’ का पक्ष रखता रहा है। नई दिल्ली का तर्क है कि ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकास की जरूरतों और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को ध्यान में रखे बिना केवल वर्तमान उत्सर्जन के आधार पर जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। भारत का यह भी कहना है कि पहले औद्योगिकीकरण करने वाले पश्चिमी देशों ने वैश्विक कार्बन बजट का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल किया है और विकसित देशों को विकासशील देशों की जलवायु चुनौतियों के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।
जलवायु विशेषज्ञों का भी कहना है कि नेपाल का योगदान वैश्विक उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम है, जबकि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से दिखाई दे रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने भी हालिया आपदा को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हुए कहा है कि हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने से जोखिम लगातार बढ़ रहा है और ऐसी आपदाओं से निपटना केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी है।
उल्लेखनीय है कि यह आपदा 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के निकट भोटेकोशी नदी क्षेत्र में शुरू हुई। ऊंचाई पर स्थित एक ग्लेशियर के टूटकर ल्हेंदे खोला जलग्रहण क्षेत्र में गिरने से बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल सैलाब नीचे की ओर बढ़ गया। इसने कई जिलों में भारी तबाही मचाई। रासुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन, गोरखा और नवलपरासी जैसे इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए। सैकड़ों लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े लगातार बदल रहे हैं क्योंकि दुर्गम इलाकों में तलाश और पहचान का काम जारी है।
सबसे गंभीर चिंता जलविद्युत परियोजनाओं में फंसे मजदूरों को लेकर है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार करीब 12 परियोजनाओं से लगभग 900 कर्मचारी लापता बताए गए हैं और लगभग 500 लोगों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। नेपाल सेना के साथ भारत और चीन के विशेष सुरंग बचाव दल उच्च जोखिम वाले अभियानों में जुटे हैं। भारतीय टीम को चिलीमे क्षेत्र की सुरंगों में सीमित जगह, दलदली फर्श और उपकरणों के इस्तेमाल में कठिनाइयों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन टीम ने अस्थायी और अभिनव तरीकों से सुरंग के भीतर आगे बढ़ने का प्रयास किया।
भारत ने राहत अभियान तेज करते हुए लगातार सहायता भेजी है। नेपाल में 163 भारतीय नागरिकों को बचाए जाने की सूचना है। भारत ने एक विशेष फोरेंसिक टीम भी काठमांडू भेजी है। चीन भी दूसरे चरण की राहत सामग्री भेज रहा है, जिसमें ड्रोन, डीएनए परीक्षण उपकरण और जल शोधन प्रणालियां शामिल हैं। मृतकों की पहचान के लिए चीनी विशेषज्ञ भी सहयोग कर रहे हैं।
उधर, नेपाल में हजारों सुरक्षाकर्मी राहत और बचाव अभियान में लगे हैं। हेलीकॉप्टरों के जरिए फंसे लोगों को निकाला जा रहा है और भोजन, दवाएं तथा अन्य राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। भारत ने अपने नागरिकों के लिए नियंत्रण कक्ष और आपातकालीन हेल्पलाइन भी सक्रिय की हैं। कई भारतीय पर्यटक, तीर्थयात्री और जलविद्युत परियोजनाओं के कर्मचारी प्रभावित इलाकों में फंसे थे, जिनमें से अनेक को सुरक्षित निकाल लिया गया है।
वहीं इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक चेहरा काठमांडू में दिखाई दे रहा है, जहां पहचान न हो पाने वाले शवों को अस्थायी कब्रों में दफनाया जा रहा है। प्रशासन डीएनए नमूने, तस्वीरें और अन्य पहचान संबंधी साक्ष्य सुरक्षित रख रहा है ताकि भविष्य में शवों की पहचान हो सके। उधर, कई परिवार अपने लापता प्रियजनों की तलाश में अस्पतालों और मुर्दाघरों के चक्कर काटने के बाद अब प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं। 12 वर्षीय रोजेल श्रेष्ठ ने अपने लापता पिता की आत्मा की शांति के लिए भूसे और जौ से बने प्रतीकात्मक पुतले को अग्नि दी।
बहरहाल, नेपाल की यह त्रासदी अब केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह हिमालय की बदलती जलवायु, ग्लेशियरों के बढ़ते खतरे और वैश्विक जिम्मेदारी पर एक बड़ा सवाल बनकर उभरी है। लेकिन इसी के साथ नेपाल का भारत समेत बड़े उत्सर्जक देशों से मुआवजे का दावा जलवायु न्याय की बहस को और जटिल तथा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना रहा है। फिलहाल, जमीन पर सबसे बड़ी प्राथमिकता बहस नहीं, बल्कि जिंदगियां बचाना, लापता लोगों को ढूंढना और तबाह परिवारों को राहत पहुंचाना है।