Prabhasakshi NewsRoom: जेल से शुरू हुआ राजनीतिक सफर कॅरियर के अंतिम पड़ाव में KP Sharma Oli को फिर जेल ले गया

By नीरज कुमार दुबे | Mar 28, 2026

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के लिए जेल कोई नई जगह नहीं है। युवा अवस्था में राजशाही के खिलाफ आंदोलन के दौरान उन्होंने 14 साल जेल में बिताए थे, जिनमें चार साल एकांत कारावास भी शामिल था। लेकिन इस बार कहानी अलग है। इस बार वह सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सत्ता में रहते हुए लिए गए फैसलों के कारण जेल पहुंचे हैं। यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक पतन माना जा रहा है। देखा जाये तो नेपाल की राजनीति में कभी सबसे मजबूत और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले ओली का सफर अब एक नाटकीय मोड़ पर पहुंच गया है। दशकों तक कम्युनिस्ट राजनीति में सक्रिय रहने वाले ओली चार बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन वर्ष 2025 के हिंसक युवा प्रदर्शनों के बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से गिरा और अब वह गिरफ्तार हो चुके हैं।

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सितंबर 2025 में हुए युवाओं के प्रदर्शनों ने उनके राजनीतिक कॅरियर को झकझोर कर रख दिया। इन प्रदर्शनों की शुरुआत उनकी सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध से हुई, लेकिन इसके पीछे बेरोजगारी, आर्थिक ठहराव और भ्रष्टाचार को लेकर जनता में गुस्सा भी बड़ा कारण था। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब प्रदर्शन हिंसक हो गए और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 77 लोगों की मौत हो गई। इस दौरान भारी पैमाने पर सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। विरोध इतना तेज हुआ कि भीड़ ने ओली के घर, संसद और सरकारी कार्यालयों को भी निशाना बनाया। आखिरकार ओली को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

अब उसी मामले में शनिवार को बड़ा कदम उठाते हुए पुलिस ने ओली को भक्तपुर स्थित उनके निवास से गिरफ्तार कर लिया। पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को भी इसी मामले में हिरासत में लिया गया। यह कार्रवाई गृह मंत्रालय की शिकायत और जांच के बाद जारी वारंट के आधार पर की गई। बताया जा रहा है कि यह गिरफ्तारी उस आयोग की सिफारिशों पर आधारित है, जिसकी अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश गौरी बहादुर कार्की ने की थी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ओली, रमेश लेखक और तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग पर आपराधिक लापरवाही का आरोप लगाया है। नेपाल की दंड संहिता की धारा 181 और 182 के तहत इन पर मुकदमा चलाया जाएगा, जिसमें अधिकतम 10 वर्ष की सजा हो सकती है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हिंसा को रोकने के लिए पहले से खुफिया चेतावनी मौजूद थी, लेकिन समय रहते कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। हालांकि यह साबित नहीं हो पाया कि गोली चलाने का सीधा आदेश दिया गया था, लेकिन यह जरूर कहा गया कि गोलीबारी रोकने की कोशिश भी नहीं की गई। उधर, ओली ने हमेशा इन आरोपों से इंकार किया है। उनका कहना है कि उन्होंने कभी गोली चलाने का आदेश नहीं दिया और हिंसा के लिए बाहरी तत्वों को जिम्मेदार ठहराया।

इस बीच, ओली की पार्टी ने उनकी गिरफ्तारी को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जांच रिपोर्ट में गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त आधार नहीं है और यह कदम राजनीतिक मंशा से उठाया गया है। पार्टी ने इस मुद्दे पर आपात बैठक भी बुलाई है।

हम आपको यह भी बता दें कि यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब नेपाल में नई सरकार बनी है। 35 वर्षीय बलेंद्र शाह ने एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है और उनकी अगुवाई में कैबिनेट ने आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया। इसी के बाद यह कार्रवाई तेज हुई। नई सरकार ने साफ संकेत दिया है कि वह जवाबदेही तय करने और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए सख्त कदम उठाएगी। वहीं दूसरी ओर, इस गिरफ्तारी ने नेपाल की राजनीति को और अधिक गरमा दिया है।

बहरहाल, एक समय खुद को देश बनाने वाला नेता बताने वाले ओली आज गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। उनका यह राइज एंड फॉल न केवल नेपाल की राजनीति के उतार चढ़ाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि बदलती सत्ता के साथ जवाबदेही कैसे तय होती है। आने वाले दिनों में यह मामला नेपाल की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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