नेता जी की आंसू बहाने की नई कला (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Oct 01, 2024

हरियाली, सुख-समृद्धि, और विकास का सपना देखने वाले नेताओं की सूची में नाम न देखकर विलाप करने वाले नेता जी पर जब हम नजर डालते हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या इनकी पूरी राजनीति का आधार केवल अवसर की तलाश है? न जाने कितने चश्मे हैं जिनसे नेता जी ने टिकट की लिस्ट देखी, लेकिन इन चश्मों की ताकत भी कभी इतनी कमज़ोर नहीं हुई कि इन्हें सही नाम न दिखा सके। आह! क्या यही है सच्ची राजनीति का मर्म?

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लिस्ट में नाम न देखकर आंसू बहाना, नेता जी की नयी उपलब्धि है। ये वही नेता हैं जो कभी दूसरों के आंसू पोंछने का दावा करते थे, आज खुद आंसू बहाते हुए दिख रहे हैं। शेर की तरह दहाड़ने वाले ये नेता अब बिलकुल गीदड़ की तरह रो रहे हैं। हाय! यह राजनीति की ऐसी रंगीन चादर है, जो एक तरफ दिखाती है परछाई और दूसरी तरफ बुनती है विडंबना।

जब इन नेताओं ने अग्निवीर स्कीम का समर्थन किया था, तब यह कोई अजीब बात नहीं थी। लेकिन अब जब अग्निवीर की राजनीति उन पर लागू हो गई है, तो आंसू की धारा बह रही है। इनकी स्थिति ऐसी हो गई है जैसे किसी बगीचे में पानी देने की बजाय हर पौधे को कलेवा देने लगे हों। जब तक यह फुल-टैंक थे, सब ठीक था। अब पंख लगे हैं और पानी की कमी का रोना शुरू हो गया है।

किसी समय इन नेताओं ने बेरोज़गारों की लिस्टों में नाम न देखकर अपनी शान बखानी थी। अब खुद की लिस्ट में नाम न देखकर वही नेता जी फफक-फफक कर आसमान सिर पर उठा रहे हैं। अरे भाई! जब बेरोज़गारी की लिस्ट पर फेंकने की बारी थी, तब किसी ने नहीं सोचा कि ये आंसू भी कभी अपने दरवाजे पर दस्तक देंगे।

नेता जी की राजनीतिक यात्रा एक ऐसे नाटक की तरह है, जिसमें हर दृश्य की कहानी अलग होती है और अंत में सब कुछ बेमोल निकलता है। अब ये नेता जी उस नाटक के बुरे अभिनेता की तरह हैं, जो जब मंच पर आता है तो सिर्फ अजीबो-गरीब हरकतें करता है। क्या नेता जी की वास्तविक राजनीति का यही मतलब है, कि जब तक लाभ है तब तक मुस्कान, और जब दिक्कत आए तो आंसू?

नेता जी का हाल ऐसा, जिसमें डूबता हुआ आदमी तिनके का सहारा लेता है। इन नेताओं ने कभी संजीवनी बूटी की तरह अपने वादों से जनता को ढांढस बंधाया, लेकिन जब खुद को किल्लत का सामना करना पड़ा, तो यही नेता जी आंसुओं की झड़ी लगाने लगे। अरे भाई, तुम्हारी लिस्ट का नाम न देखकर रोने की बजाय अगर उन लोगों के बारे में सोचा होता जिनकी भर्ती कैंसिल हो गई, तो शायद दिल बड़ा होता!

इस सबके बीच, नेता जी की राजनीति और उनकी आंसू बहाने की कला दोनों ही एक गहन अध्ययन का विषय बन गए हैं। यह व्यंग्य केवल एक टीका-टिप्पणी नहीं, बल्कि हमारी राजनीति की वास्तविकता पर एक कड़ा सवाल है। क्या राजनीति केवल अवसरों की खोज है, या फिर इसमें सचमुच लोगों की भलाई का कोई मतलब भी है?

नेता जी का नाम लिस्ट में न देखकर रोना, राजनीति के रंगमंच पर एक नई परत जोड़ता है। यह समझना जरूरी है कि राजनीति में आंसू बहाना आसान है, लेकिन सच्चे कर्म करना और समाज की भलाई के लिए काम करना, यही असली चुनौती है। जब तक नेता जी इन आंसुओं से बाहर नहीं निकलते, तब तक उनकी राजनीति भी एक मजेदार नाटक की तरह ही बनी रहेगी।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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